हिन्दी साहित्य के पूर्व मध्यकाल को अब तक
भक्तिकाल की ही संज्ञा ही जाती रही है । इसके विकल्प में न अब कोई पद समीचीन लगता
है और न हम इस विचार को तोड़ने की कोशिश करते हैं। किन्तु अब समय आ गया है कि इस पद पर पुनः विचार किया जाना
चाहिए। साहित्य भी अब पहले से अधिक समृद्ध और विचारवान हुआ है। इसका अर्थ यह कतई
नहीं है कि पुरा भारतीय साहित्य कमजोर और लिजलिजा था,बल्कि
जब हम यह कहने की कोशिश करते हैं कि अमुक साहित्य घटिया है या उसके विचार तन्तु
कमजोर और निष्प्राण हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि आप अपनी मनोवृत्ति को उस साहित्य
पर थोपने का प्रयास करते हैं। पुरा भारतीय साहित्य भले ही आज तथाकथित पाठकों और
बुद्धिजीवियों के गले से नीचे न उतर रहा हो किन्तु वे भी उस साहित्य के प्रभाव से
अछूते नहीं हैं। इसका सीधा अर्थ क्या निकाला जा सकता है, क्या
हम अपने दोहरे चरित्र में जी रहे हैं या फिर इसके कोई अन्य कारण भी हो सकते हैं।
जरा विचाए कीजिए कि सामाजिक पक्षधरता या फिर कविताई की
बात करते समय हम पूर्व मध्यकालीन साहित्य की दुहाई क्यों देते हैं ,क्या हमारे पास नये साहित्य में ऐसा कुछ नहीं लिखा या पढ़ा जा रहा है,सम्भवतः ऐसा नहीं है। विज्ञान और साहित्य दिन प्रतिदिन तार्किक और
जनतांत्रिक होता जा रहा है। भले ही कुछ मायनों में इसकी सीमाएँ देखी जा सकती हैं।
आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भक्ति आंदोलन के उदय के कारण
की तलाश इस्लामी आक्रमण और उसके प्रतिक्रिया में
हिन्दू जनसमुदाय में उत्पन्न पौरुष की हताशा को माना। किन्तु
आज कारण विपरीत हैं। यह समय पहले से अधिक क्रूर और अमानवीय हुआ है,हिन्दू जातियों को गैर हिन्दू जातियों से उतना खतरा नहीं है जितना स्वयं
हिन्दू जाति से है। दार्शनिक और पूजा पद्धति की तकनीकियां भी बदल गयी हैं। अब वे
पुराने देवी देवता नहीं रह गये हैं, जिनसे सामान्य जनता का
लगाव था। बल्कि अब कामर्सिलाइज देवी देवता और उनके संत ही इस धारा को आगे बढ़ाने
की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि इस भक्ति भावना से सामान्य जनता का कोई खास लेना
देना नहीं है और न आज के साहित्य को इस कामर्सिलाइज़ भक्ति से जोड़कर देखने की
जरुरत है। आज जबकि भक्तिपरक कविताएँ भी लिखी जा रही हैं, उन्हें
पढ़ने और सुनने के लिए हम सहज नहीं हैं तो क्या लगभग सात सौ वर्ष पूर्व के साहित्य
को जिसे भक्ति साहित्य ही कह दिया गया है,उसे आप पढ़ना पसन्द
करेंगे? सम्भवतः आपका जवाब नहीं होगा। इसका कारण यह है कि हम
कामर्सिलाइज़ और फंडामेंटल धर्म के बरक्स उस विचार को देखने की कोशिश करते हैं और
प्रायः पाते हैं कि भक्ति हमारे लिए उपयोगी नहीं रह गयी है। उससे अधिक जरुरत
रोजगार, समानता और हमारे मनुष्य होने की है। हम सामान्य
जनमानस को बहला फुसलाकर उसे ईश्वर के प्रति डराकर अब नहीं रख सकते। उसे ईश्वर का
दास बनना अब बिल्कुल पसन्द नहीं, वह मन मुताबिक जैसा चाहता है,उसे वैसा बना सकता है। चाहे
तो उसके साथ रह सकता,और चाहे तो नहीं । वह निर्णय लेने के लिए
स्वतंत्र है।
नौवें दशक तक भक्ति साहित्य को समझने के मानदंड में काफी बदलाव आया।
हम उस साहित्य को भक्ति के चश्मे से नहीं सामाजिक पक्षधरता और कविता की नग्न आंख
से देखने लगे। उसे समझने के लिए भक्ति का पुराना चश्मा अब बेकार हो चुका था। हमारी
जरुरतों और विकसित मानवीय विचारों ने हमें अन्दर से मजबूत बनाया। भक्ति साहित्य
हमें कविता और जनपक्षधरता के लिए उपयोगी साबित हुआ किन्तु नौवें दशक के बाद उसी
साहित्य को पढ़ते समय बड़े बड़े गड्ढे और सदियों से दी जाने वाली यातनाएँ आंखों
में चुभने लगी। हम कोशिश करते रहे कि भक्ति साहित्य को किसी प्रकार से मानवीय और आंखों के लिए कोमल बनाएं। किन्तु बात बाहर
निकल चुकी थी, यहाँ तक की भक्ति साहित्य पर काम करने वाले
प्रगतिशील लोग भी भक्ति के नाम पर लाल पीले हो जाते ,लेकिन
कविताई की धुन में ताल से ताल जरुर मिला लेते। पाठकों को उनका यह व्यवहार कैसे समझ
में आता। उनके किताब का शीर्षक पढ़ते तो वही भक्ति की गंध उमड़ घुमड़कर उठने लगती ,उन्हें घुटन होने लगती और अंदर (कंटेंट) पढ़ते तो मन को कुछ तसल्ली अवश्य मिल जाती। इस कश्मकश में
भक्ति साहित्य को समझना तो दूर उसे पढ़ने और पढ़ाने वाले लोग ही इक्का दुक्का अभी
तक बचे हुए हैं।
असल में पूरा मसला भक्ति का है। हालांकि कि उस साहित्य में भक्तिपरक
कविताओं का प्रतिशत सामाजिक पक्षधरता, काव्यशास्त्रीय
मानदंडों, बिम्ब विधानों, संगीतमयता के
सामने नगण्य है। उस समय की कविता पढ़ते समय हमें भक्ति
के अंधेरे रास्ते से नहीं, कविताई के गलियारों से गुजरना
चाहिए और आप पायेंगे कि उस समय का साहित्य भक्तिपरक नहीं बल्कि मीमांसापरक है।
उसका बोध तार्किक है ,चाहे वह दर्शन से संवाद करता हो या
सामाजिक मूल्यों से अथवा कविता की शास्त्रीयता से....
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सुशील द्विवेदी
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