घन कुंतल-मेघ घिरे
गीत/ कविताएँ
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| राजेन्द्र गौतम |
1. घन कुंतल-मेघ घिरे
घन कुंतल-मेघ घिरे
दिङ्नूपुर झनक उठे
जब कुंतल-मेघ घिरे
कब सुध-बुध क्षण-पल की
चम-चम-चम जब चमकी
चंचल-चंचल जल की
हीरक-सी छवि, छलकी
ऐसी रस-धार बही
मन डूबे, डूब तिरे
घन कुंतल-मेघ घिरे
चेतनता तन की हर
रहा अन्धकार उतर
अम्बर, भू-आँगन भर
यौवन की उठें लहर
ज्वार राग का उमडा
बन्धन-तट टूट गिरे
दिङ्नूपुर झनक उठे
रोम-रोम रोमांचित
तंद्रिल, विश्लथ, कम्पित
हास-सुधा-उर-सिंचित
हुए अधर-पुट कुंचित
दल के दल शतदल के
आनन पर आन फिरें
जब कुंतल-मेघ घिरे
घन कुंतल-मेघ घिरे
दिङ्नूपुर झनक उठे
3.3.1979
गीत पर्व आया है, दिगंत प्रकाशन, 1983, पृष्ठ:37
2. दूर पर अलकापुरी
मेघ गंभीरा नदी पर यों झुका आकुल हुआ,
कूल मानो मिल गया उसकी असिंचित प्यास को
जब लगा नभ से बरसने प्यार ही जलधार में,
गंध व्याकुल कर गई मेरे विमूर्छित श्वास को
पंख लेकर कल्पना के मैं उड़ा उस लोक तक,
जब किसी बीते हुए आषाढ़ की सुधि आ गई
यक्षिणी की देह-वल्ली तृप्त हो रसधार से,
मेघ-से अपने पिया का गूढ़ चुम्बन पा गई
एक विद्युत-सी छिटकती देह के आकाश से,
स्पर्श से जन्में पुलक के झनझनाते राग-सी
बूंद भी प्यासी स्वयं थीं पी रही थीं रूप को
मेंह से जो और भड़की वह सुनहली आग थी
यक्ष शापित रामगिरि का पर उपेक्षित ही रहा,
झिलमिलाती स्वप्न-सी है दूर पर अलकापुरी
पोंछते हैं अश्रु ही उसकी प्रिया के चित्र को,
सिसकियों डूब जाता गीत उसका आखिरी
फूल धर कर देहरी पर गिन रही जो रात-दिन,
आँख में तिरती रही वह शिशिर-मथिता पद्मिनी
मलिनवसना हो गई ज्यों चंद्रिका बिंबाधरा,
भटकती सुनसान में ज्यों एक क्षामा रागनी
3. मेघदूत आया है
अधसोई घाटी पर
आतुर-सा यायावर
बादल झुक आया है.
गगन-गुफा में जाकर
अनहद में डूब गई,
अब थी अब गायब है
शायद रस-बूँद हुई
यों लगता है जैसे
धूप किसी कबिरा की
वेदांती माया है.
मुग्ध ग्रामिकाओं की
चल चितवन को हरषा
‘गंभीरा’ का जल पी
‘वानीरों’ को सरसा
‘अलका’ के चिर उदास --
आँगन में फिर मेघदूत आया है.
हवा चली खनकाती
लय-छंदों की पायल
रेशमी फुहारों का
उड़-उड़ जाता आँचल
आषाढ़ी अम्बर से
उतर आज धरती पर
‘गीतपर्व’ आया है.
13.7.1981
गीत पर्व आया है, दिगंत प्रकाशन, 1983, पृष्ठ:94
4. बिजली का कुहराम
डल से
लोहित तक
ये बादल
खबरें ही बरसाते।
रोज़ विमानों से
गिरतीं हैं
रोटी की अफवाहें
किंतु कसे हैं
साँप सरीखी
तन लहरों की बाहें
अंतरिक्ष से
चित्रित हो हम
विज्ञापन बन जाते।
किस दड़बे में
लाशों का था
सब से उॅंचा स्तूप
खोज रही हैं
गिद्ध्-दृष्टियाँ
अपने-अपने ‘स्कूप’
कितने -
किस्मत वाले हैं हम
मर सुर्खी में आते।
कल तक सहते थे
लूओं का
हम ही क़त्ले-आम
आज
हमारी ही बस्ती में
बिजली का कुहराम
बची-खुची साँसें
निगलेंगी
कल पाले की रातें।
5. हुए पराजित गाँव
बादल आए इंद्रधनुष ले
टूट पड़ी सेना अंबर से
हुए पराजित गाँव।
बाँस बरोबर आया पानी
बहती जाती छप्पर-छानी
फिर भी मस्ती में ‘रजधनी’
यों तो उत्सव-संध्याओं में
चर्चे इनके ही होते हैं
पर आशंकित गाँव।
ढाणी, टिब्बों फोग-वनों में
कैसा छाया ‘सोग’ मनों में
भय का फैला रोग जनों में
बिजली कोड़े बरसाती है
खाल उधेड़ी इसने तन की
थर्-थर् कंपित गाँव।
किधर गया रलदू का कुनबा
बिखर गया हरदू का कुनबा
बदलू का भी डूबा कुनबा
बोल लावणी के कजली के
सब गर्जन-तर्जन में डूबे
छितरा जित-तित गाँव।
20.8.1996
बरगद जलते हैं, अनुराग प्रकाशन, 1998, पृष्ठ: 52
6. तैर रहे हैं गाँव
धारा उपर
तैर रहे हैं
सब खादर के गाँव।
टूटे छप्पर
छितरी छानें
सब आँखों से ओझल
जहाँ झुग्गियों के
कूबड़ थे
अब जल, केवल जल
धँसी कगारें
मुश्किल टिकने
हिम्मत के भी पाँव।
छुटकी गोदी
सिर पर गठरी
सटा शाख से गात
साँपों के संग
रात कटेगी
शायद ही हो प्रात
क्षीर-सिन्धु में
वास मिला है
तारों की है छाँव।
मौसम की
खबरें सुन लेंगे
टी वी से कुछ लोग
आश्वासन का
नेता जी भी
चढ़ा गए हैं भोग
निविदा
अख़बारों को दी है
बन जाएगी नाव
घास-फूस का
टप्पर शायद
बन भी जाए और
किंतु कहाँ से
लौटेंगे वे
मरे, बहे जो ढोर
और कहाँ से
दे पाएँगे
साहुकार के दाँव
18.8.1992
बरगद जलते हैं, अनुराग प्रकाशन, 1998, पृष्ठ: 54
7. इंद्रासन की तुरुप-चाल
कल बस्ती थी आज ताल है.
बूढ़ी माँ
टूटी खटिया को
मुश्किल छत तक ठेला
लोटा-थाली
आटा-दालें
संग गया ले रेला
जल है यह या एक जाल है.
सोना तो
मेरी गोदी थी
रूपा कौन सँभाले
धनिया को भी
लील गए थे
आसपास के नाले
बाढ़ नहीं यह महाकाल है.
बेघर तो
पहले से ही थे
अब छूटा फुटपाथ
पा लेंगे क्या
सभी निवाले
जितने पसरे हाथ
डालों पर भी कहाँ छाल है.
कौन उठाएगा
छिगुनी पर
अब के यह गोवधर्न
इनका तो खुद ही संकट में
रहता है सिंहासन
इंद्रासन की तुरुप-चाल है.
8. टपक रहीं हैं खपरैलें
इस बादल का जल काजल-भर
ज्योतित रेख नहीं कोई।
इसके गर्जन से थर्राता
चिंताकुल बूढ़ा आकाश
लादे है
यह ‘वसुंधरा’ भी
छाती पर केवल संत्रास
अँधियारे सब गलियारे हैं
दीपित लेख नहीं कोई।
फोटोग्राफी : आत्मानंद कश्यप
कीच-भरी
धॅंसती आँखों-सी
टपक रहीं हैं खपरैलें
मन के
सब विश्वास डुबाए
फैले जोहड़ मटमैले
आश्वासन के
दूर क्षितिज तक
अब आलेख नहीं कोई।
अपने संग ले गई
बहा कर
सपने सब जंगली नदी
खड़े तटों पर
बचे लोग
हैं देख रहे डूबती सदी
सुनते भर हैं
गाँव यहाँ था
पाया देख नहीं कोई।
9.2.1982
9. विंध्याचल में वर्षा: तीन बिम्ब
नंगी पीठ पहाड़ों की।
बादल ने फटकारे कोड़े
औचक ही जब जलधारा के
खाल बैल की सिहरा करती ज्यों
पाकर चुभन अनी की
सिहर उठी यों विध्याचल में
नंगी पीठ पहाड़ों की।
लप-लप बिजली की तलवारें
दसों दिशाएँ भाँज रही हैं
रणभेरी तब बजी दूर से
विंध्याचल में फैल गयी जब
तड़-तड़ गूँज नगाड़ों की
नंगी पीठ पहाड़ों की।
साखू के गहरे जंगल में
मेघ गीत गाती है
विंध्याचल कन्याएँ
दे-दे कर ताली
दूर गये वे तपते दिन
दूर बहुत हैं बातें अब
उन ठिठुराते जाड़ों की
सिहर उठी है
नंगी पीठ पहाड़ों की।
6.6.1996 हैदराबाद से ट्रेन से लौटते हुए.
बरगद जलते हैं, अनुराग प्रकाशन, 1998, पृष्ठ: 111
राजेंद्र गौतम
906, झेलम, प्लॉट 8, सेक्टर 5, द्वारका, नई दिल्ली-110075
मो. 9868140469
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