सिय मुख ससि भये नयन चकोरा

                आलेख  

             

सुशील द्विवेदी 

‘मेघदूत’ पर परिचर्चा के दौरान एक मित्र ने पूछा कि मेघदूत की अभिसारिका कायर क्यों है? यह सवाल जितना सरल था, उतना जटिल भी | सोचता हूँ कि महाकवि के मन में ऐसा विचार क्यों आया कि वे  स्म भुर्विक्लवास्ता: अर्थात क्योंकि वे कायर होती हैं लिख बैठे | यक्ष मेघ से आग्रह अवश्य करता है कि वह उज्जयिनी की अभिसरिकाओं को अपनी दामिनी से पथ दिखलायें किन्तु गर्जन न करें | गर्जन करने पर वे डर जायेंगी | इस बात से तो यह स्पष्ट है कि वह शुक्ल अभिसारिका नहीं है, बल्कि कृष्ण अभिसारिका है | मोला राम की एक पेंटिंग में महाकवि कालिदास की इसी बात को दर्शाया गया है | फ़र्क सिर्फ इतना है कि मोला राम की पेंटिंग में कृष्ण अभिसारिका को रास्ते में साँप मिल जाता है | यह दृश्य अपने आप में भयावह है- बादलों से घिरी अँधेरी रात, बिजली का चमकना, साँप का फन फैलाकर खड़ा हो जाना किसी भी व्यक्ति के भय के लिए पर्याप्त है वह चाहे स्त्री हो या पुरुष | अभिसारिका कृष्ण पक्ष की रात्रि को चुपके-चुपके दबे पाँव पिय से मिलने का साहस कर रही है | वह कायर नहीं हो सकती है | उसके ह्रदय में भय और उत्साह का प्रस्फुटन एक साथ अवश्य हो रहा है | मोलाराम की पेंटिंग उस दृश्य को अधिक रोमांचकारी बनाती है - मृत्यु, भय, प्रेम, उत्साह, विछोह का एक साथ संयोजन | सोचता हूँ कि हमारा कौन वह आदिप्रेमी रहा होगा जिसने प्रेम को देह से इतर अर्कजा-मुद्रा की भांति लय से समझने की चेष्टा की होगी | उस तरुण-योगी मन में सागर की तरह दिन-ब-दिन वैसा ही अनहद नाद उमड़ता रहा होगा | उसने प्रेम को समझने की हजारों निष्फल कोशिशें की होंगी | वन लताओं से फूल चुनते समय पंखुड़ियों के स्पर्श मात्र से उसकी प्रेयसी की अनंत भाव भंगिमाएं अचानक कौंध गयी होंगी... और हमन है इश्क मस्ताना जैसे कुछ गुनगुनाते हुए , वहाँ से वापस लौटने में उसे विलम्ब हुआ होगा | इस विलम्ब के लिए उसने जरुर डांट खाई होगी अपनी प्रेमिका से | ऐसा नहीं है कि प्रेमिका कठोर-मन की रही होगी, उसके पास भी वैसी ही भावनाएं रही होंगी जैसे उसके मन में थीं | पेट और समय दोनों ही प्रेम के बड़े शत्रु हैं | ‘खालीऔर अतिरिक्त भरे पेटसे प्रेम नहीं होता | समय प्रेम की अबाध गति को रोकता है और इसका भान भी दिलाता चलता है कि जिस शाश्वत सत्य की वह तलाश कर रहा है, वह अपूर्ण और आश्रयी है | संभवतः प्रेम दुनिया का सबसे जरुरी खोज हुआ होगा और इस महज ढाई आखर के लिए क्या-क्या नहीं किया गया होगा? उसे समझने में न जाने कितने शिलालेख, काष्ठ-लेख, मुद्रित-अमुद्रित किताबें लिखी गयी होंगी, फिर भी वह अपूर्ण है, सांसारिक अनिवार्य सत्य है अन्यथा भला कोई मृत्यु को ही पूर्ण क्यों मानता है? मृत्यु भी तो कितना अधूरा शब्द है प्रेम की तरह बल्कि दो पूर्ण अक्षरों में बंधा हुआ रित्यानी अबाध गति | यह सोचते ही रूह काँप रही है, दम घुट रहा है, रक्त नलिकाओं से खून बाहर निकलने के लिए मचलने लगा है... नहीं नहीं मृत्यु अंतिम शांति नहीं है...शांति और शाश्वत है तो केवल प्रेम जो अधूरेपन से पूर्णता की ओर ले जाता है...और उसका विच्छेद सन्नाटे की ओर..., दुःख या यातना की ओर नहीं | सन्नाटा का अपना खास तरह का लय है, उसीका उदात्त लय प्रेम- विच्छेद में है .... यही अधूरी इच्छाएं उस अभिसारिका और प्रिय के मन में अवश्य हिलोरें भर रही होंगी |

     छत्तीसगढ़ के एक प्रचलित आख्यान के अनुसार सीता बेंगरा में अपने वनवास के दौरान सानुज  राम और सीता यहाँ ठहरे हुए थे | यहीं भारत की सबसे प्राचीन नाट्यशाला है और यहीं जोगीमारा की गुफा जिसकी दीवार में सुतनुका देवदासी और प्रेमी देवव्रत के चित्र बने हुए हैं इन्हीं शैल चित्रों को देखकर महाकवि कालिदास ने इसी स्थान पर मेघदूत की रचना की थी | इस आख्यान से एक बात स्पष्ट है कि यह स्थान राम और सीता, देवव्रत और सुतनुका के मिलन का स्थान है | जाहिर है कि वन लताओं,पर्वत श्रृंखलाओं, पशु-पक्षियों, झरने और नाना प्रकार की ध्वनियों के बीच प्रेम का उत्सव कैसा रहा होगा | यह अकल्पनीय है | अब सवाल यह है कि राम की शक्ति पूजा में युद्ध के उपरान्त पराजित मन राम को सीता की कुमारी छवि की स्मृति क्यों आती है ? सीता बेंगरा जैसे न जाने कितने स्थानों की स्मृतियाँ उनके मन में होंगी फिर उसकी स्मृति क्यों नहीं?   

          पृथ्वी-तनया-कुमारिका-छवि  अर्थात् सीता की छवि झलकते ही संशयात्मा राम के मन में ऊर्जा का संचित कोष पुष्प-पंखुड़ियों की भांति विवृत्य होने लगा | यही देह की ताकत है जो रामको भी शक्ति प्रदान करती है | कई बार किसी की छवि चाहे वह पुरुष हो या स्त्री हमारे अन्त:स्थल में ऊर्जा का सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव उद्घाटित करती है| या नहीं भी कर सकते हैं किन्तु प्रायः ऐसा कम होता है | देह से सकारात्मक ऊर्जा प्रेम में संभव है | इसीलिए भी देह की स्मृति मात्र से प्रेमी मन में अनियंत्रित ऊर्जा का उद्गार होने लगता है | आप अपलक उसे देखते रहते हैं | एक आख्यान है कि जनक के पूर्वज निमिपलकों पर निवास करते हैं | उन्होंने राम और सीता के मिलनको देखना उचित नहीं समझा इसीलिए वे पलकों से हट गये जिसके कारण पलकें ऊपर भ्रकुटोन्मुख स्थिर हो गयीं यानी वे अपलक सीता को देखते रहे | शायद यही कारण है कि निमिष और निर्निमेषशब्दों का प्रयोग पलक या अपलक नेत्रों के लिया होता चला आया है | सह-जीवन की आशंकाएं और संशय का निस्तारण इसी प्रेम में निहित है | इसीलिए प्रथम मिलन में सीता थके नेत्रों से राम को देखती है- थके नयन रघुपति छवि देखें या फिर धनुष भंजन के समय सीता के मन में राम की छवि देखते बनती है, वे धनुष से राम की तुलना करती हैं कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा, कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा  | होंगे राम सभा ही दृष्टि में विष्णु अवतार किन्तु प्रेयसी की निगाह में वे कोमल ही हैं | इतने कोमल कि जितने फूल शिरीष के | उस फूल से हीरा को बेंधवाया जा रहा है - सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा | अब राम संशय में हैं | राम और रावण के युद्ध में रावण दुर्धर्ष योद्धा साबित हो चुका है | उसको पराजित करने में राम नाकों चने चबा चुके हैं | शिविर में सानुज साथियों सहित थके, सर झुकाए बैठे हैं | कोई दृष्टि नहीं मिल रही है ; किन्तु सीता के स्मरण मात्र से उन्हें दृष्टि मिल जाती है- विश्व-विजय-भावना ह्रदय में आई भर और अगले युद्ध में राम विजयी होते हैं |

     प्रो. चन्द्रदेव यादव से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि  कुमारिका का अर्थ है दस से बारह वर्ष के बीच की लड़की | कहीं-कहीं यह उम्र आठ से दस वर्ष भी बताई गई है, ध्वनि यह है कि वह लड़की जिसे अभी रजोस्राव नहीं हुआ है | भारतीय धर्म और संस्कृति में कुमारी लड़की बहुत पवित्र मानी गयी है, दुर्गा को भी कुमारी कहा गया है | वागीश शुक्ल के अनुसार – (1) कुमारी उस विवाहित स्त्री को भी कहते हैं जिसके पति ने उसे विवाह के पूर्व की स्त्री को अन्य स्त्री के रूप में अंगीकार नहीं किया है | इस अर्थ में जानकी जी के लिए कुमारिका संगत है क्योंकि राम ने उनके अतिरिक्त किसी को अपनी स्त्री का दर्जा नहीं दिया है (2) कुमारी कुण्डलनी का एक नाम है | कु का अर्थ है पृथ्वी तत्व वह जिसमें लीन हो जाये अर्थात मर जाये | इन दोनों मतों से यह बात स्पष्ट है कि दस से बारह वर्ष की सीता के लिए सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने कुमारिका पद का प्रयोग किया है | तुलसीदास ने राम को किसोर बताया है | प्रसंग है - विश्वामित्र राजा दसरथ से यज्ञरक्षनार्थ राम और लक्ष्मण की मांग कर बैठते हैं | राजा दसरथ कहते हैं – कहँ निसिचर अति घोर कठोरा | कहँ सुन्दर सुत परम किसोरा | केवल यही प्रसंग नहीं बल्कि अन्य प्रसंगों में विवाह से पूर्व राम के लिए किसोर शब्द का ही प्रयोग करते हैं जबकि सीता के लिए पहली बार जनंक वाटिका के प्रसंग में जनु सिसु मृगी  पदबंध का प्रयोग करते हैं जबकि सखियों के लिए सयानी शब्द का | अवधी में सयानी दस से बारह वर्ष की लडकी को भी कहते हैं | जाहिर सी बात है कि सीता सखिओं के समवय होंगी अर्थात उनकी उम्र विवाह के समय लगभग दस-बारह वर्ष रही होगी |  प्रो. चंद्रदेव यादव के मत के आधार पर कह सकते हैं कि सीता विवाह के समय दुर्गा के समवय थीं | इसीलिए शक्ति की आराधना करने के लिए राम सीता के उसी वय को याद कर रहे हैं जिस वय की दुर्गा अर्थात शक्ति हैं |  इस कुमारिकाके मिलन के तुरंत पश्चात आम किशोर की भांति राम सीता के मुख की तुलना चन्द्रमा से करते हैं और यहाँ तक कह देते हैं कि मेरे नेत्र चकोर हो गये हैं- सिय मुख ससि भये नयन चकोरा | और सिय मुख की आभा में डूबने उतराने लगते हैं |ऐसा देह आकर्षण के कारण हुआ, स्वाभाविक नहीं | यही कारण है कि वे कहते हैं कि सभी उपमाओं को कवियों ने जूठा कर दिया है और उनको कोई उपमा सूझ नहीं रही है सब उपमा कबि रहे जुठारी, केहिं पटतरों बिदेह कुमारी.. ठीक यही स्थिति अज्ञेय की उस समय हुई जब उन्होंने लिखा कि सब उपमान मैले हो गये हैं.. देहयष्टि और उसके आकर्षण में प्रेम संभव नहीं है यही कारण है कि विद्वानों ने प्रेम में निकटतासे अधिक स्पेशपर बल दिया है | इसी स्पेशके फलस्वरूप तत्वबोध होता है जिसके जरिये हमें परम आनन्द की प्राप्ति होती है और यही तत्वबोध राम को स्पेशमिलने के बाद हुआ, जिसे बाद में संध्या वंदन के समय उन्होंने विचार किया कि सीता की देह चन्द्रमा की भांति नहीं हो सकती हैसीय बदन सम हिमकर नाहीं.. और चन्द्रमा की तमाम खामियों की गणना करते हुए विश्लेषण करने लगते हैं | मुख से बदन तक की यात्रा कोई युवा मन ही समझ सकता है | आपको अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है | जयशंकर प्रसाद कामायनीमें श्रद्धा की देह का विश्लेषण करते हुए उपमाओं की बारिश करने लगते हैं | श्रद्धा सर्ग की आरम्भिक ८ पंक्तियों को छोडकर २४ पंक्तियाँ श्रद्धा की देह की उपमाओं के विश्लेषण में खर्च करते हैं जिसमें स्त्रीलिंग और पुलिंग विशेषणों की भरमार है -

घिर रहे थे घुँघराले बाल,

अंस, अवलंबित मुख के पास।

नील घनशावक-से सुकुमार,

सुधा भरने को विधु के पास।

हमने देखा कि नायिकाओं के रूप वर्णन में चन्द्रमा की उपस्थिति सामान्यत: सभी जगह मिल है  किन्तु नायक के रूप वर्णन में ओज और कठोर वस्तु उपमेय का प्रयोग होता आया है | यहाँ तक कि स्त्री रचनाकारों ने नायकों की उसी कठोर ओजपूर्ण छवि को स्वीकार किया है | मीरा जैसी विद्रोही चेतना की कवयित्री भी इससे बच नहीं सकीं | उन्होंने श्री कृष्ण के गिरिधर रूप को स्वीकार किया है, वे मुरलीधर हैं, मयूरपंख धारण करते हैं, यह उनके गिरिधर रूप को अधिक आकर्षक बनाता है | उनका नवनीत रूप मीरा को पसंद नहीं है | उर्वशी और पुरुरवा के संवाद को ले लीजिये, पुरुरवा का पौरुष सिन्धु से अधिक तरंगित करने वाला है, उसकी भुजाओं में अतुलित बल है| उसका सामना रणक्षेत्र में कोई नहीं कर सकता है उसकी शक्ति का जयकार दसों दिशाओं में गूंजता है | दिनकर लिखते हैं –

सिन्धु-सा उद्दाम, अपरम्पार मेरा बल कहाँ है?

गूँजता जिस शक्ति का सर्वत्र जयजयकार,

उस अटल संकल्प का संबल कहाँ है?

 

यह शिला-सा वक्ष, ये चट्टान-सी मेरी भुजाएं

सूर्य के आलोक से दीपित, समुन्नत भाल,

मेरे प्राण का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है.

 

सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं,

कांपता है कुण्डली मारे समय का व्याल,

मेरी बांह में मारुत, गरुड़, गजराज का बल है.

इससे यह बात स्पष्ट है कि नायकों की रूप साम्यता कठोर, ओजपूर्ण और कलात्मक वस्तुओं से हो सकती है | किन्तु तुलसीदास ने रामचरितमानस में धनुषभंजन के उपरांत राम की तुलना चन्द्रमा से किया है | वह अर्द्ध चन्द्र नहीं बल्कि पूर्णचन्द्र यानी राकेश – रामरूप राकेसु निहारी | बढ़त बीचि पुलकावलि भारी अर्थात रामरुपी पूर्णचन्द्र को देखकर पुलकावली रुपी लहरें बढ़ने लगी हैं | अब आप विचार कर रहे होंगे कि घनश्याम वर्णी राम की तुलना राकेश से करना वर्ण विरोधाभास होगा | किन्तु यहाँ राकेश वर्ण का नहीं, अपितु शीतलता परिचायक है | हालाँकि इस किशोर रूप पूर्व बालरूप में न जाने कितनी स्मृतियाँ होंगी जो शीतलता प्रदान करती हैं, किसी रचनाकार ने चन्द्रमा से उसकी तुलना नहीं की | यदि की भी होगी तो मेरी दृष्टि में नहीं आया है, वह सायास नहीं हुआ होगा |  प्रो.चन्द्रदेव यादव ने बातचीत के दौरान शिव के धवल रूप की व्याख्या करते हुए एक श्लोक जिक्र किया –

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भवं भवानीसहितं नमामि।।

इस श्लोक में शिव कर्पूरवर्णी अर्थात् धवल हैं | ईश्वर का रंग जनमानस के रंगों के अनुरूप होगा | यह समझिये कि भालू अपने लिए ईश्वर की कल्पना करता है तो उसका ईश्वर उसकी देह और रंग के अनुरूप होगा | उसका ईश्वर मनुष्य के अनुरूप नहीं होगा | विष्णु के सभी अवतारों का रंग प्रायः नीलवर्णी है, एक उदहारण देखिये –

नवकंज लोचन, कंजमुख ,करकंज पद कंजारुणं

कंदर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद सुन्दरं

इसमें राम की छवि शिशु बादल के रंग की है | यक्ष, गन्धर्व, कुबेर, देव का रंग गौर वर्णी है श्याम वर्णी नहीं | ये सभी अलकापुरी के आसपास के क्षेत्र के हैं | ऊपर कैलाशपति शिव का वर्ण धवल बताया गया है क्योंकि वे बर्फानी क्षेत्र से हैं  जबकि विष्णु के अवतार मैदानी भागों से | हमारी देह का रंग मिट्टी,जलवायु और रक्त आधारित होता है | बाद में पलायन, संसर्ग और वैवाहिक संबंधों से रंगों में परिवर्तन होता चला गया, इसके साथ ही तुलनीय वस्तुओं में भी | यही स्थिति देवियों या नायिकाओं की है | शक्तिपीठ क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति को समझने से उनकी दैहिक रंगों को डिकोड कर पाएंगे | काली शक्तिपीठ के निवासिनों का रंग दुर्गा शक्तिपीठ या कामख्या पीठ के क्षेत्र से भिन्न होगा | रंग साम्यता के आधार पर सीता की तुलना दुर्गा से संभव है, काली से नहीं | काली से उनकी तुलना क्रोध या विकराल रूप के अर्थ में होगी जो कि प्रलयंकारी है | दुर्गा क्रोध में शत्रु संहारिका हैं, आम व्यक्ति की नहीं | जबकि काली क्रोध के वशीभूत आमजन को प्रभावित करती हैं | यह लोक हित में नहीं है | महाप्राण निराला ने प्रिय यामिनी जागी कविता में स्त्री के रूप की तुलना दिनकर से करते हैं | संभवतः हिंदी कविता का यह पहला प्रयोग है जब स्त्री की तुलना ओजपूर्ण वस्तु से की गयी-

खुले केश अशेष शोभा भर रहे,

पृष्ठ-ग्रीवा-बाहु-उर पर तर रहे,

बादलों में घिर अपर दिनकर रहे,

ज्योति की तन्वी, तड़ित-

द्युति ने क्षमा माँगी। 

उनके यहाँ स्त्री का केवल कोमल रूप नहीं है,ओजपूर्ण भी है इसलिए महाप्राण निराला के राम सीता की कुमारिका छवि की स्मरण होते ही दुर्गा की स्तुति की संकल्पना मन में आ जाती है यानी कि स्त्रैण छवि में ओज का भाव | स्मरण रहे कि हमने नायिकाओं की तुलना चन्द्रमा से की है | सीता के वर्ण को  समझने के लिए उनके मानवीय रूप को समझना अनिवार्य है | हमने देखा है कि तुलसी के राम सीता से प्रथम मिलन में उनकी तुलना चंद्रमा से कर बैठते हैं | क्या आपने कभी विचार किया है कि चन्द्रमा की सोलह कलाएं और सात रंगों में से किस वर्ण और कला की तुलना सीता से की गयी है या प्रायः नायिकाओं की तुलना की जाती है ? खगोलशास्त्र शास्त्र के अनुसार मध्यरात्रि के चन्द्रमा का रंग बर्फ की तरह धवल है | मैदानी भागों के लिए बर्फ प्राणहीन होने की अवस्था है | उगता हुआ चन्द्रमा रक्तवर्णी पीत होता है जिसे गेहुवा रंग कहा जाता है | तुलसीदास ने स्पष्ट कर दिया है कि मानवीय सीता की तुलना राम ने उदीयमान चन्द्रमा से की है, स्पष्ट है कि सीता गेहुवा रंग की हैं | किन्तु प्रेमी राम ‘स्पेश’ मिलने के बाद चन्द्रमा की तुलना को नकारते हैं | उस समय सीता की छवि भौतिक उपमानों से परे है | केशवदास ने भी रामचन्द्रिका में इसी भौतिक उपमानों से परे सीता की रूपछटा का वर्णन किया है| यही भौतिक से आधिभौतिक उपमानों की प्रक्रिया सीता को स्त्री से देवी बनाती है इसीलिए सीय बदन सम हिमकर नाहीं l l   

 

पेंटिंग : मोलाराम 

                                                                                                                           सुशील द्विवेदी 

                                                                                                                        संपादन एवं स्वतंत्र लेखन 

                                                                                                    सम्पर्क - susheeld.vats21@gmail.com


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