हेरा तथा अन्य कविताएँ

    

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सुशील द्विवेदी 

डायरी का पीला वरक

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(एक)

सुबह के 4 बजे हैं

जिन्हें जगना था, जग गये हैं

हेरा अभी सोई है

क्योंकि उसे अभी सोना है।

स्कॉच की टूटी बिखरी बोतलों सा

मैं जगकर क्या करूंगा

कुछ नहीं, सिर्फ औंधा पड़ा रहूंगा।

हेरा को देखता हुआ...

(दो)

आज सोमवार है

मुझे शिव मन्दिर जाना है

हेरा भी छुपछुपाकर वहाँ आयेगी

उसे अपने प्रेमी से डर है

वह किसी से मिलने की इजाजत नहीं देता.

(तीन)

शाम के पाँच बजे हैं

मैं उल्टी- पेंटिंग बना रहा हूँ

- चिड़िया, आकाश,पर्वत, नदी

सब मेरी कूची के सहारे जन्मे

किन्तु  हेरा...?

हेरा पेंटिंग नहीं है

वह मेरे स्वप्न लोक की सर्जक है

(चार)

सुबह आशु ने किताब दी

मैंने पढ़ना शुरु किया

और शाम तक

सिर्फ "हे.... रा.." पढ़ा

उसे अडंर लाइन किया

एक नहीं, कई कई रंगों से...

(पाँच)

आज हेरा का खत मिला

लिखा है - वासु को

उसकी शिष्या से प्रेम हो गया है

वासु गुरु है, उसे अक्सर

सुन्दर शिष्या से प्रेम हो जाया करता है

(छः)

आज मैंने देव की कविता पढ़ी

और उसके चंद शब्दों को रंग दिया

- "काजल, आँखें, जुल्फ़ें,रुख्सार, होंठ"

इसके अलावा और एक शब्द

जिसे देव ने नहीं

मैंने लिखा था - हेरा

(सात)

सुबह के पाँच बजे हैं

बकुल ने आवाज़ दी - "साहेब ! ... चाय "

मैंने एक कप चाय ली

खिड़की से बाहर झांककर देखा, मुस्कुराया -

- वासु, पेंटिंग, किताबें, कविताएँ सब ख्वाब थे।

केवल हेरा थी जो हवा- सी

मेरे होंठों पर खिल रही थी

 

कल्की

••••••• 

(लहर : एक)

"अक्की! 

मेरा ख्वाब न देखा करो

मैं किसी और की हूँ ना

यह पाप है, निरा पाप!"

उस दिन मेरे बालों को सहलाते हुए तुमने कहा था।

कल्की! 

एक बात पूछूं

सच-सच बतलाओगी

तुम्हारे भीतर यह पागल प्रलाप किसका है?

मेरा ही है ना?

वायलिन की तरंगों सा चुपचाप छाती में उतरता।

 

(लहर : दो)

कह दो,

कि मैं झूठा हूँ 

बिल्कुल झूठा तुम्हारी तरह

निष्कलंक, निश्छल, निर्वासित ।

कह दो,

कि मेरा मोह महज भुलावा है

'प्राणसत्य है, अंतिम है।

कह दो

कि 'कनिया'°° मेरी नहीं है।

 

(लहर : तीन)

कल्की! 

उठो, चलो, कहीं दूर भाग चलें

शिमला की किसी दुर्गम घाटी के किनारे

बर्फ़ से ढ़के देवदारुओं के तले

उठो कि जीने का यह सही समय है

उठो कि सत्य फिर से जी उठे

उठो कि अंतर फिर से बह चले 

उठो! उठो! और केवल उठो! 

अपने लिए, मेरे और कनिया के लिए।

 

(लहर : चार)

कल्की! 

शुक्र तारा को देखो

प्राची का पहला प्रेमी

ओह कितना अ मलिन, मृदु भाषी! 

बिल्कुल दुधमुँहे शिशु की तरह

प्रेयसी के होंठों को छूकर सिहर उठता है

प्रेमी का सिहरना बुरा है

बोलो!  बोलो ! 

 

(लहर : पाँच)

उठो यहाँ से दूर चलें

उठो कि इससे पहले प्राची का दूसरा प्रेमी मुझे ताके

कनखियों से सटकने के लिए कहे

उठो! चलें कहीं दूर

प्राची अब महावर लगायेगी

सजेगी दुल्हन की तरह

फिर ओस के नन्हें-नन्हें स्वर्ण कलशों को

 पैरों से ढरकायेगी, तान्दुल बिखेर देगी भूमि पर।

उठो कल्कि ! कहीं दूर चलें

कि इससे पहले प्राची के केस

दुग्ध धारा की तरह चमक उठें

देह क्षीर सागर की तरह हिलोरे भरे

उठो ! इससे पहले कि प्राची का तीसरा प्रेमी आ जाये

 

प्राची प्रेमिका है

वह कहीं नहीं जाएगी

जाते हैं प्रेमी अपनी प्रेमिका के पास। 

 

(लहर : छः)

कल्की! 

कहो ! आग दाहकता भूल जाये?

राकेश भूमि को छोड़ दे, कहीं और चला जाये?

छोड़ना आसान नहीं है

भूलना उससे भी ज्यादा मुश्किल।

 

कल्कि !

तुम ख्वाब की तरह आई थी

प्राण-सी चली गयी।।

 

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°प्राण प्राणनाथ का संक्षिप्तरुप । कल्की अपने पति को प्राणनाथ कहती है।

°° कनिया कल्की और अक्की की बेटी का नाम है।

 

 

कोवा°

•••••••

(एक)

समय से पहले ही

उसके जीवन में

कई बार बरस गये थे बादल। 

पुस्तकालय के दरख्तों के पीछे,

खलिहानों, बगीचे, प्राचीन किले, मकबरे

सभी जगह। कभी तपते रेत की तरह गिरते,

कभी कना-से। कभी नन्हें-नन्हें छर्रे से।

वह हर बार सिर्फ सुबुककर रह जाता

सिर्फ सुबककर..।

 

(दो)

हवा उसकी माँ है, बादलों की प्रेमिका।

हवा उसे जन्म देती है, संवारती है।

अँधेरे में उसे लोरियां भी सुनाती है।

फिर बादलों के सिरहाने बैठकर 

रात भर हठखेलियां करती है।

वह थकती नहीं है, जी भर काम भी करती है।

 

(तीन)

बादल उसका अघोषित पिता है

गुरु है, प्रेमी भी। 

वह उसकी माँ से प्रेम नहीं करता

केवल मां करती है उससे प्रेम। और वह

केवल कोवा से। 

 

(चार)

 उसके लिए कोवा

शिष्य है, प्रयोगशाला भी। 

उसने चंद शब्द इसी प्रयोगशाला में इजात किये थे-

छिकला, गूझा, गोही, और तो और - नर्म डंठल।

 

मां काम के समय

कोवा को छोड़ देती है उसके पास

फिर देर रात तक लौटती है काम से। 

 

दोपहर के वक्त

 कहीं से भी आ जाते हैं बादल

उससे पुचकारते हैं, प्यार करते हैं।

 

बादल एक नहीं, कई-कई बार आयेंगे

प्यार करेंगे उसे।

कोवा झिझकेगा, झटकेगा

आखिर में टूटकर बिखर जायेगा।।

 

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°महुआ का फल। गदराए फल में खास तरह की मादकता होती है। 

 

 

उसके बाद

••••••••••••

उसके बाद सिर्फ तुम थी

सिर्फ तुम...

नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। 

मेरे पास तुम थी

उसकी स्मृतियाँ भी थीं

जो हर रात नुकीली पत्थरों की तरह

मेरे सीने में धंसती रही।

 

कई बार 

नदी की तेज धारा में

उलटे तैरता रहा छपाछप

या किसी सूनी अनजान सड़कों पर 

देर तक चलता रहा नंगे पाँव

ताकि उसको भूलकर लौट सकूं तुम्हारे पास

 

स्मृतियों की मेघ-माला से तत्क्षण

क्या लौट सकूंगा तुम्हारे पास,

सिर्फ तुम्हारे पास

 

 इंटरव्यू के दो दिन

(क्रमागत)

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(पहला दिन)

पूरे शहर में

उन आँखों को खोजने के बाद

चुपचाप अपने बिस्तर में आकर लेट गया।

यह सोचते हुए -

वे आँखे, जिनके बारे में मैं नहीं जानता

कि आखिरकार वे किसकी आँखे हैं

जिन्हें बिन पहचाने, मैं खोजता रहा दिन भर। 

 

रात्रि के सन्नाटे में

करवट बदलते हुए 

किसी की सिसकियां

मेरी आत्मा को बार-बार खुरेचती रहीं 

सुबह उठकर मैंने पाया,

बिस्तर की सिलवटों में 

साफ-साफ उभरी हुई उसकी आँखे।

 

वे उभरी हुई आँखे

मेरी आत्मा हैं

जिन्हें पिछले दिनों मैं चौराहे में छोड़ आया था। 

 

(दूसरा दिन)

 

अगले दि‌न

जल्दी-जल्दी 

रिकॉर्डिंग के कुछ जरुरी सामान

खाने पीने की वस्तुएँ,

झोले में भरकर

उन आँखों को कैप्चर कर लेने की असीम अकुलाहट लिए 

चीनी के बोरे- सा 

ऑटो में जाकर बैठ गया। 

 

चा० - सा'ब जाना कहाँ है?

मैं-  वहींजहाँ वे रहती हैं । 

चा० - किन्तु कहाँ?

मैं -  यह मैं नहीं जानता हूँ, मुझे वहाँ ले चलो

जहाँ वे मिलती हैं - राजधानी के किसी चौराहे पर,

या सुदूर 

झाड़ियों के उस पार

चिपचिपाती हुई बन्द गलियों में

जहाँ पसीछती हुई दीवारें

हर रात उनके थके हुए पांवों की पीड़ा-सी 

फटने लगती हैं।

 

सारा दिन ऑटो 

इस चौराहे से उस चौराहे तक

कभी रेंगता, कभी दौड़ता रहा। 

न वे मिली, न वे आँखें ही,

जिन्हें खोजते हुए 

अपनी प्रेमिका के

सबसे लम्बे बोसे को याद करता रहा..

 

यकीन कीजिये,

वे आँखें मेरी दूसरी प्रेमिका थी

जिन्हें पाने के लिए 

मुझे पहली प्रेमिका को भूल जाना था।

x...x...x...x...x...x...x...x...x...x

 

देर रात तक 

क़तील शिफाई को पढ़ते-पढ़ते

कविताओं से शब्द धीरे-धीरे झिलमिलाते हुए गायब हो गये

 

 किसी रंगशाला के दर्शक-दीर्घा में 

प्रतीक्षारत, मैं अकेला श्रोता। 

मंच के राइट विंग से 

सफेद धुएं-सा धीरे-धीरे फैलता प्रकाश  

आड़ी-तिरछी रेखाओं से बनते शब्द

शब्द से वाक्य,

वाक्य से कविता- 

"दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह"।

 धुआँ रंग बदलता है

आकृतियाँ छटपट बदल जाती हैं

ताली को उठे दो हाथ

न स्त्री ,न पुरुष,

केवल - अन्य, अन्यों का करतलनाद। 

 

दिशाएँ लुप्त हैं,

मैं कहाँ हूँ, कहाँ..?

मुझे यहाँ नहीं होना चाहिए। 

छटपटाता हूँ,

मेरे दोनों हाथ कुर्सी से बाँध दिये गये हैं

चाहकर भी वहाँ से भाग नहीं सकता, विवश हूँ मैं ।

 

नेपथ्य से 

बाज़, मोर, सियार और बच्चों के

रुदन की आवाजें एक साथ सुनाई देती हैं,

न ये दिन है और न रात,

फिर ऐसा क्यों

कोई विदूषक तो नहीं आ रहा?  

नहीं, बिल्कुल भी नहीं

साधु है वह,

खंजरी बजाते, नाचते- गाते हुए आगे बढ़ रहा है- 

"कौन ठगवा नगरिया लूटल हो" । 

 

अचानक शार्ट सर्किट

चिर्र...र्र....र्र..र्र..चिट्..चिट.. .ध्डाम् 

सब शांत, केवल अँधेरा... 

केवल अँधेरा।  

रंगशाला की दीवारों में 

उभरती हैं विदूषक की आकृतियाँ 

नाचती, कला करती

मेरे आसपास फैल जाती हैं,

एक नहीं, हजारों -हज़ार विदूषकों की आकृतियाँ । 

वे आकृतियाँ जैसे मेरे वतन के लोग हों

घूस घटोस, चोरी-छिनैती

हत्या में पारंगत

कोई उछलकूद में,

कोई जन की उल्टी खोपड़ी से

रक्तपान करने में,

कोई उनकी देह के खरीद-फरोक्त में ।

 

उफ् ! यह समय कितना जन विरोधी है !  

जोर-जोर से अकुवाते हुए 

जग उठता हूँ -

सूखता गला, पानी की तीव्र प्यास

अँधेरे में टटोलता हूँ - 

उफ् ! कहाँ गयी, कहाँ गयी पानी की बोतल।   

 

बालकनी में 

खड़े होकर मैंने सिगरेट सुलगाई और सोचा - 

'स्वप्न में की गयी हत्या

जागृत व्यक्ति की हत्या से अधिक भयावह होती है। 

फिर 'जिनरो' लेने के बाद

ट्रांस सुनते-सुनते सो गया ।

   

किसी धूमलोक में उछलते कूदते 

गांजे और शराब के नशे में 

उन्मत्त

प्रेमिकाओं के बाहुपास में

कपास-से गिर-गिर पड़ते युवा

भागो भागो, यहाँ से भागो -

दहाड़ती किसी सिक्योरिटी गार्ड की आवाज़ 

गाल पर 

किसी अजनबी का ज़ोरदार थप्पड़  

हकबकाकर,

मैं फिर से जग उठता हूँ    

 

© सुशील द्विवेदी







 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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