"कितने आनंदित हो जाते हो तुम "

आचार्य !
जब तुम्हारा कोई चरण छूता है,
कितने आनन्दित हो जाते हो तुम,
उठने लगता है तुम्हारे ह्रदय में मंगल-चक्रवात,
बढ़ने लगता है तुम्हारा कद,
छूने लगते हो तुम आसमान ,
जोड़ने लगते हो तुम पर्वत श्र्ृंखलाएं,
मापने लगते हो तुम नदी,झरने और समुद्र,
बांधने लगते हो दिशाएं,
और
एक ही झटके में दे डालते हो
किसी भस्मासुर को
कम्पाउन्डर, डांक्टर
या
फिर असिस्टैंट का वरदान।
आचार्य!
नहीं समझ पाते तुम
किसी बीहड़, जंगली इलाके से आए छात्र को
जो
दूर,
कई मीलों दूर
बनें तुम्हारे आश्रम में चला आता है
तुमसे कुछ सीखने,
अपने कुल,वंश,समाज की
अज्ञानता मिटाने।
आचार्य!
तुम नहीं समझ पाते
कि
उसकी मां पिछले ही दिनों,
बीमारियों से जूझते जूझते मर गयी थी।
तुम नहीं जान पाते
कि
उसका बाप कर्ज में डूबते हुए
अपनी अस्थियों को गला रहा है,
बस
इसी आशा से किकोई आचार्य
हमारे बच्चों को भी कुछ दिखायेगा
जिससे
शायद अशिक्षा का कलंक मिट जाये।
आचार्य!
तुम नहीं जान पाते
उस छात्र के लगन,मेहनत और ईमानदारी को,
तुम नहीं आंक पाते,
उसकी प्रतिभा को
जो ढेबरी में अपनी आंख गडा गडाकर पढ़ा है,
आचार्य!
तुम नहीं समझ पाते,
किसी छात्र का मरना ,
क्योंकि
तुमने किसी असभ्य को
छात्र होने का वरदान दे दिया है।।
"सुशील द्विवेदी "

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
पर आचार्य
तुम समझ सकते हो
क्योंकि
तुम भी कभी वह छात्र थें
जिसने ढेबरी में
आँखें गडाकर की थी पढाई
उस मकाम को पाने के लिए
जिससे
आज देते हो वरदान
किसी भस्मासुर को..

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कविता में गाँव की उपस्थिति

"कविता"

नींद गहरी है