Birthday Culture and Girl
‘ 'बर्थडे
संस्कृति और स्त्री
'’
आज समूची
दुनिया में बर्थडे
संस्कृति यानि जन्मदिन
को याद करने
का प्रचलन सा
चल गया है
|एक जमाना था
की लोग अपने
बच्चे की पैदाइश
की तिथि तक
भूल जाया करते
थे |अक्सर पूछने
पर पता चलता
था कि अमुख
कि जब शादी
हुई थी तब
यह बच्चा पैदा
हुआ था या
घर में जब
कोई नया सामान
या कोई नयी
घटना घटती थी
तो उस घटना
से जोड़ कर
लोग याद रखते
थे | प्रत्येक संस्कृति
में मूलतः बच्चे
का जन्म
दो रूप में
होता है पहला
स्त्री और पुरुष
के संसर्ग के
परिणाम स्वरुप और
दूसरा जब उसे किसी
धर्म में दीक्षित
किया जाता है|
पुरुष और स्त्री
के संसर्ग के
फलस्वरूप उत्पन्न हुई संतान
इतिहास से परे
अपना जीवन क्षण
भर के आनंद
में गुजारती है
|वही क्षण उसका
इतिहास है और
वही भविष्य |उस
क्षण के अतिरिक्त
न तो उसका
कोई इतिहास होता
है न तो
उसका कोई भविष्य
|धर्म {religion } में दीक्षित
संतान कि अपेक्षा
वह भेदभाव से
मुक्त स्त्री और
पुरुष का संतान
है |
जब व्यक्ति
का जन्म किसी
धार्मिक कर्मकांड के तहत
होता है |इसे
धार्मिक भाषा में
संस्कार भी
कहते हैं |हिन्दू
धर्म में इसे उपनयन
संस्कार 'मुस्लिम में खतना
[circumcision ]| प्राचीनकाल में स्त्री
और पुरुष दोनों
का उपनयन संस्कार
होता था |लेकिन
अब केवल पुरुष
का स्त्री को
इस धार्मिक भाषा
से मुक्त रखा
गया |हलाकि कि
वह अब भी मुक्त
नहीं हो पायी|
उपनयन न सही
बाकी कर्मकांड तो
उसके हिस्से में
बचे हैं |मुस्लिम
समुदाय में पांच
वर्ष कि उम्र
में लड़के
और लड़की दोनों
का खतना किया
जाता है | अफ्रीका
की आदिवासी
संस्कृति को इसके
लिए देखा जा
सकता है |
इधर बीच
बर्थडे का प्रचलन
जोरों से सुनाई
दे रहा है|
वर्ष 2014 में जब
दिल्ली आया | दिल्ली में
बर्थडे का एक
नया रूप देखने
को मिला |इससे
पहले मेरे जेहन
में बर्थडे का
मतलब वही घिसा
पीटा रूप जिसमे
केक ,कुछ गिफ्ट
,और कुछ बधाइयाँ
सम्मिलित हुआ करती
थी |बर्थडे का
मतलब मेरे जेहन
में काल के
विशेष खंड से
संबंधित था जिसमे
केवल अनुभव था
प्रेम और आनंद
का सम्मिलित अनुभव
|
दिल्ली बर्थडे संस्कृति
का अनूठा उदाहरण
है | बर्थडे संस्कृति
की विविधता यहाँ
बहुत आसानी से
देखने को मिलती
है |बहुस्तरीय बर्थडे
संस्कृति जिसमे प्रत्येक प्रान्त
और धर्म की
मिलीजुली लिजलिजाती संस्कृति जो एक
दूसरे से चिपकी
हुई है बिलकुल
तारकोल की तरह
|जिसके प्रत्येक रेशे को
अलग अलग करके
समझना थोड़ा मुश्किल
है |
दिल्ली को अगर
चार भागों में
बाँट कर देखें
तो बर्थडे संस्कृति
को आसानी से
समझा जा सकता
है | दिल्ली विश्वविद्याल
के आसपास के
इलाके जैसे विजय
नगर ,न्यू गुप्ता
कॉलोनी ,हडसनलेन, मोरिश नगर,
शक्ति नगर इत्यादि
मुहल्लों की
बर्थडे संस्कृति |मुझे याद
है जब मैं
न्यू गुप्ता कॉलोनी
के एक फ्लैट
में रहता था
|फ्लैट के सामने
आयदिन बर्थडे का
आयोजन हुआ करता
था |मैं अक्सर
सोचता था कि
फ्लैट में रहने
वाले व्यक्तियों [संख्या
में चार ]का
बर्थडे माह में
कितनी बार आता
है |मैं हैरान
हुआ यह जानकर
कि बर्थडे मानाने
वाले कोई आम
छात्र न थे
|यह वे लोग
थे जो छात्र
हितों के लिए
आयदिन आंदोलन किया
करते थे |किसी
सम्मानित राजनितिक पार्टी से
जुड़ा यह छात्र
संगठन सिर्फ नाम
का छात्र संगठन
था |बांकी बिजनेस
से लेकर वे
सारे काम हुआ
करते थे जो
छात्र हित से
परे थे |
हर शाम
को चमचमाती हुई
गाड़ियों से उतरती
हुई लड़कियों का
नया नया समूह
मेरे जैसे तमाम
मुहल्ले वालों के लिए
हैरानी का विषय
था | लड़कियों के
फ्लैट पर पहुचते
ही सपना चौधरी
,हनी सिंह ,अर्जित
सिंह जैसे गायकों
का मधुर गीत
बजने लगता बजने
लगता फिर कुछ
ही देर बाद
तालियों के गड़गड़ाहट
के बीच'' हैप्पी
बर्थडे टू यू''का समूह
गान सुनाई पड़ता
| थोड़ी देर के
बाद बालकनी में
लड़कियों का
तेज फुसफुसाहट भरा स्वर
सुनाई पड़ता '' देख
तो अन्नू कितना
बड़ा कमीना है
मेरे साथ जबरजस्ती .... ''अन्नू
ही नहीं अयान
भी .....|अंदर से
मीठी आवाज़ सुनाई
देती '' भाभी ''| लड़कियां
भाभी नाम सुनते
ही फूलने उतराने
लगती | भाभी शब्द
उनके लिए किसी
जन्नत से कम
न था | जिस
क्षण वे भाभी
शब्द सुनती थी
वह क्षण उनके
लिए आनंद का
क्षण होता,, त्याग
और समर्पण का
क्षण होता |वह
घायल हुई शेरनी
कि तरह कमरे
की तरफ भागती
|थोड़ी देर में
फ्लैट से नीचे उतरती मुरछाई
सी पैरों को
इधर उधर रखती
हुई शराब के
नशें में धुत लड़कियां
..... फिर कभी वह
फ्लैट में न
आती और न
ही वह किसी
की भाभी बन
पाती|
जब कोई
बर्थडे का नाम
लेता है मुझे
बर्थडे का यह
तरीका मेरे जेहन
में कौंधने लगता
है |जहाँ बर्थडे
के नाम पर
कॉलेजों की लड़कियां
हवस का शिकार
हुआ करती हैं
|लेकिन आज तक
इस बर्थडे से
निकली हुई किसी
भी लड़की को
मैंने पुलिस स्टेशन
में जाते हुए
या रपट लिखवाते
हुए नहीं पाया
|मेरे सहयोगी अक्सर
बताया करते हैं
कि केवल छात्र
नेता ही नहीं
बड़े बड़े प्रोफ़ेसर
,नेता और यहाँ
तक कि अधिकारियों का
जन्म दिन भी
मानाने का कुछ
ऐसा ही तरीका
है फर्क है
कि छात्र नेताओं
के बारे में
मालूम हो जाता
है लेकिन उनके
बारे में नहीं
..मैं जब थोड़ी
गहराई पर सहयोगियों
से बात करना
शुरू कि तो
पता चला कि
किसी बड़े अधिकारी,
किसी पार्टी के
बड़े नेता से
मिलने का तरीका
भी अलग है
|वहां लड़की साथ
में नहीं ले
जाई जाती बल्कि
उन्हें बुलाया जाता है
, उनके रुकने का सारा
प्रबंध भी किया
जाता है और
लड़की से मुलाकात
करवाते समय यह
कहा जाता है
कि '' सर यह
आपका उपहार है
''|मुझे घिन आती
है ऐसे लोगो
से जो मंच
पर ,लेखों में
अपनी पक्षधरता मानते
हुए शोषण का
नया तरीका इजात
करते रहते हैं
|
दिल्ली विश्वविद्यालय से
कुछ दूर स्थित
बत्रा, मुखर्जी नगर ,नेहरू
विहार,गाँधी विहार
आदि जगहों
में बर्थडे मानाने
का तरीका न्यू
गुप्ता कॉलोनी या विजय
नगर से थोड़ा
अलग है |बिहार
,उत्तर प्रदेश से आईएएस
बनने का सपना
लिए लड़कों और
लड़कियों के लिए
पूरे दिल्ली में
इससे पवित्र जगह
और कहीं नहीं
है बांकी जगहों को हेय
दृष्टि दे देखते
हैं | ये भावी
आईएएस का बर्थडे
मानाने का तरीका
भी निराला है
...मुझे याद है
जब मैं न्यू
गुप्ता कॉलोनी वाले फ्लैट
को छोड़कर
नेहरू विहार में
एक छोटा सा
फ्लैट लिया था
|उनदिनों इन भावी
आईएएस के बर्थडे
मानाने का तरीका
भी आज के
तरीके से आसान
और कम खर्च
में हुआ
करता था लेकिन
अब खर्च
भी अधिक हो
गया गया है
और मानाने का
तरीका भी |इन
भावी कर्णधारों के लिए
जन्म दिन पर
दारू कि बोतल
और बर्थडे में
कम सा कम
एक लड़की तो
जरूर होनी ही
चाहिए |लड़की के
बिना इनका जन्मदिन
नहीं मनाया जा
सकता |लड़की की उपस्थिति
वहां भी विषयी
है | विषय वासना
के अतिरिक्त लड़की
का कोई वजूद
नहीं रह जाता
|मुझे याद है
कि जब मुझसे
मिलने एक शोध
छात्रा आयी थी
उसने जिक्र किया
था कि बत्रा
से नेहरू विहार
आते समय लड़के
उसे कैसे देख
रहे थे कैसे वैसे
जान बचाकर नेहरू
विहार तक आयी
|अब आप इस
घटना से ही
अनुमान लगा सकते
हैं कि आईएएस
बनने से पहले
जब लड़के इस
तरह कि घटनाओं
को अंजाम देते
हैं तो आईएएस
बनने के
बाद क्या करेंगे
यह
अनुमान लगाना थोड़ा
मुश्किल है |
यमुना पार करावल
नगर जैसे इलाके
इन सब इलाकों
से अच्छे नहीं
कहे जा सकते
|बर्थडे पार्टी बस नाम
की रह गयी
है |बर्थडे के
नाम पर कोई
नंगा नाच इनसे
सीखे |
जवाहर लाल नेहरू
विश्वविद्यालय ,जामिया मिल्लिया इस्लामिया
या फिर आंबेडकर
विश्वविद्यालय के आस
पास इलाके
भी अछूते नहीं
हैं |हलाकि दिल्ली
विश्वविद्यालय ग्लैमरस और चकाचौंध
के मामले में
अन्य विश्वविद्यालयों की
अपेक्षा अधिक है
|फिर भी बर्थडे
संस्कृतियों में स्त्री
को देखने का
नजरिया लगभग एक
ही जैसा आपको
देखने को मिल
जायेगा |
सुशील द्विवेदी
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