साहित्य सम्बन्धी प्रेमचंद की चिंतन-दृष्टि
आशुतोष तिवारी (लेखक आशुतोष तिवारी दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र हैं | आप उनसे दिए गये संपर्क सूत्र से संवाद कर सकते हैं
पता- डी.एस. कोठारी हॉस्टल, दिल्ली विश्वविद्यालयई-मेल- ashutoshtiwari2017@gmail.com
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साहित्य क्या है? साहित्य किसके लिए है? और साहित्य में क्या होना चाहिए? इन प्रश्नों के सबके लिए अलग-अलग मायने हैं। चूँकि हर साहित्यकार की सोचने समझने की दशा और दिशा काफी हद तक अपने समकालीन परिवेश से निर्मित होती है, इसीलिए प्रेमचंद की साहित्य-चिंतन दृष्टि पर हमें गाँधी के मूल्यों, स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जोर-आजमाइश करते लोगों की आशाओं-अपेक्षाओं, द्विवेदीयुगीन नैतिकता एवं पूँजीवादी-सामंतवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में उभरे साम्यवादी मूल्यों का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। उल्लेखनीय है कि यह प्रभाव उनके यहाँ अंधानुकरण में तब्दील नहीं होता है क्योंकि बाकौल, जैनेन्द्र कुमार 'उनकी कलम अँधेरे में भी धोखा नहीं खाती है।'1
प्रेमचंद मतलब एक साधारण खाते-पीते निम्नमध्यवर्गीय किसान घर का आदमी, जिसके पास इतना तो है कि वह अपने को जिन्दा रखकर; दुनिया के जलते हुए वसूलों, बढ़ती हुई कुरीतियों, केचुए की तरह बिलबिलाते हुए लोगों, पाई-पाई सहेजने-बटोरने की कोशिश करते बेसहारों एवं हल के जुआठ को कंधे पर धरे, साहूकार के पैसे से मिली तंबाकू को मुँह में घुमाते किसानों को देख सके। वह उन्हें भी देख सके जो अपने-आपको शासक समझकर मूँछों पर ताव दिए घूमते थे और उन्हें भी जो अपनी फिसलती हुई जिंदगी को पूरी जद्दोजहद के साथ फिसलने नहीं देना चाहते थे। प्रेमचन्द की साहित्य चिंतन-दृष्टि इन्हीं दो आत्यन्तिक लकीरों के बीच से उपजी मनुष्यता की मशाल है।
अमृतराय ने ठीक ही कहा है कि प्रेमचंद के पास केवल एक ही कसौटी थी- किसान।2 वे इसी कसौटी पर हर चीज को परखते थे और समझ लेते थे कि कौन-सी चीज समाज, साहित्य और देश के लिए हितकर है कौन चीज अहितकर। लेकिन उनके साहित्य चिंतन का केन्द्र बिन्दु किसान है, इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी साहित्य को देखने-समझने की दृष्टि रूढ़िवादी है। कमल किशोर गोयनका ने इस संदर्भ में लिखा है कि ‘‘प्रेमचन्द साहित्यशास्त्र अथवा आचार्य नहीं थे, किंतु उनके पास साहित्य, साहित्यकार, उपन्यास, कहानी आदि को देखने की आधुनिक दृष्टि थी।’’3
प्रेमचंद साहित्य की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि ‘‘मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना’ है। चाहे वह निबंध के रूप में हो, चाहे कहानियों के या काव्य के उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।’’4 उनका यह कथन सिर्फ रीतिकालीन कटि-नितंबों की पूजा करने वालों को ही आईना नहीं दिखाता है वरन्, उन लोगों को भी जो साहित्य को जीवन से अलग काट कर देखते हैं और उसके लिए ‘कला कला के लिए’ का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं। प्रेमचंद को पता है कि ‘पूस मास की धूप सुहावन’ चावल नहीं रिझा सकती और रोटी नहीं सेंक सकती है, इसलिए वे ‘कला जीवन के लिए’ की तरफ अपना झुकाव प्रदर्शित करते हैं।
प्रेमचंद न तो सिर्फ नारेबाजी को ही साहित्य की श्रेणी में शामिल करते हैं और न ही सिर्फ शब्द उपासना को। अधिक सरलीकृत रूप में कहें तो वे वस्तु और रूप के सामंजस्य पर बल देते हैं। उन्होंने ‘साहित्य का उद्देश्य’ निबंध में लिखा है कि ‘‘साहित्य उसी रचना को कहेंगे, जिसमें कोई सचाई प्रकट की गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित और सुन्दर हो...।’’5
प्रेमचंद साहित्य में हर भावों के समावेशन पर बल देते हैं, क्योंकि इसके बिना साहित्य जीवन की समग्र तस्वीर नहीं दिखा पाएगा। जो लोग साहित्य में सिर्फ श्रृंगार- श्रृंगार की रट लगाये फिरते हैं उनके लिए प्रेमचंद ‘और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा’ की तर्ज पर कहते हैं कि ‘‘साहित्य का उद्देश्य हमारी अनुभूतियों की तीव्रता को बढ़ाना है, पर मनुष्य का जीवन केवल स्त्री-पुरुष-प्रेम का जीवन नहीं है।... श्रृंगारिक मनोभाव मानव-जीवन का एक अंग मात्र है, और जिस साहित्य का अधिकांश इसी से सम्बन्ध रखता हो, वह उस जाति और उस युग के लिए गर्व करने की वस्तु नहीं हो सकता और न उसकी सुरुचि का ही प्रमाण हो सकता है।’’6
प्रेमचंद ने तिलस्मी और ऐयारी किस्म के उपन्यासों और कहानियों को खूब पढ़ा था, लेकिन जब खुद लेखनी उठाई तो साहित्य जो इन खोहों में कैद था, उससे बाहर निकाला, क्योंकि इन उपन्यासों से जो दिलबहलाव होता था उसकी हमारे समाज को जरूरत नहीं थी। उनके अनुसार इस सोते हुए समाज में ‘अगर कुछ लिखना ही है तो ऐसा कुछ लिखो जिससे यह मौत और गफलत की नींद कुछ टूटे, यह मुर्दनी कुछ दूर हो।’7
इसीलिए प्रेमचंद ‘साहित्य का उद्देश्य’ में गतिशील करने वाले साहित्य की बात करते हैं- ‘‘जिस साहित्य से हमारी सुरूचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें शक्ति और गति न पैदा हो, हमारा सौन्दर्य-प्रेम न जागृत हो- जो हममें सच्चा संकल्प और कठिनाईयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह आज हमारे लिए बेकार है, वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं।’’8
प्रेमचंद यह नहीं मानते थे कि मनुष्य अपनी सार अनुभूतियों को ही शब्दबद्ध करे। क्योंकि ऐसा होने पर रचनाकार को निरुद्देश्य साहित्य लिखने के लिए एक रास्ता मिल जाता है।
कविता निरूद्देश्य होती है कि सोद्देश्य, इस बात का जवाब देते हुए मई 1936 के ‘हंस’ में प्रेमचंद ने लिखा था- ‘‘इसलिए यह कहना कि कविता का कुछ उद्देश्य ही नहीं होता और उसको उपयोगिता के बंधन में बांधना गलती है, एक सारहीन बात है।’’9
प्रेमचंद का मानना है कि साहित्य-रचना के लिए छटपटाहट, टीस, वेदना से ओत-प्रोत संवेदनशील हृदय वाला मनुष्य आवश्यक है। धन-वैभव के मद में चूर व्यक्ति कभी भी हितकारी साहित्य की रचना नहीं कर सकता। उन्होंने ‘गोदान’ में लिखा है कि ‘‘लिखते तो वे लोग हैं, जिनके अन्दर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार है। जिन्होंने भोगविलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया है, वे क्या लिखेंगे?’’10
प्रेमचंद साहित्य-रचना के हेतु के रूप में प्रतिभा को ज्यादा महत्व देते हैं, यद्यपि उन्होंने ‘व्युत्पत्ति’ एवं ‘अभ्यास’ के महत्व को भी स्वीकार किया है, क्योंकि ‘व्युत्पत्ति’ एवं ‘अभ्यास’ को स्वीकार करने पर ‘संभावना’, साहित्य-रचना की कुछ-न-कुछ, प्रतिभा को लेकर न जन्मे लोगों के लिए भी बची रहती है-
‘‘इसमें कोई शक नहीं कि साहित्यकार पैदा होता है, बनाय नहीं जाता, पर यदि हम शिक्षा और जिज्ञासा से प्रकृति की इस देन को सार्थक कर सकें तो निश्चय ही हम साहित्य की अधिक सेवा कर सकेंगे।’’11
प्रेमचंद समाज एवं देश की बदलती हुई अभिरूचियों एवं स्थितियों के साथ ही साहित्य की कसौटी में भी परिवर्तन करने के पक्षधर थे। उनका यह मानना था कि कोई एक मानक हर युग के लिए उपयुक्त हो, यह जरूरी नहीं है, इसलिए युगानुरूप उसमें बदलाव होते रहना चाहिए। अपने समय के साहित्य को अपने समय से पिछड़ता देखकर उन्होंने लिखा कि ‘‘अब साहित्य केवल मन-बहलाव की चीज नहीं है, मनोरंजन के सिवा उसका और भी कुछ उद्देश्य है।... अब वह स्फूर्ति या प्रेरणा के लिए अद्भुत आश्चर्यजनक घटनाएँ नहीं ढूंढता ओर न अनुप्रास का अन्वेषण करता है, किन्तु उसे उन प्रश्नों से दिलचस्पी है जिससे समाज या व्यक्ति प्रभावित होते हैं।’’12 यह एक जागरूक साहित्यकार की समझ एवं बदली हुई मनोवृत्तियों का स्वीकार है।
प्रेमचंद नीतिशास्त्र और साहित्य-शास्त्र को एक ही धरातल पर खड़ा देखते है। उनका मानना है कि दोनों का लक्ष्य एक है, बस उस लक्ष्य को पाने के लिए अपनाये गए साधन में अंतर है। उनके अनुसार ‘‘नीति-शास्त्र तर्कों और उपदेशों के द्वारा बुद्धि और मन पर प्रभाव डालने का यत्न करता है, साहित्य ने अपने लिए मानसिक अवस्थाओं और भावों का क्षेत्र चुन लिया।’’13 इसलिए साहित्यकार की भावों को पकड़ने की क्षमता जितनी अचूक होगी वह उतने ही अच्छे साहित्य का सृजन कर पाएगा।
प्रेमचंद के साहित्य चिंतन की दृष्टि प्रगतिशील थी। माफ कीजियेगा साहित्यकार के साथ मुझे ‘प्रगतिशील’ शब्द नहीं जोड़ना चाहिए था क्योंकि प्रेमचंद के अनुसार ‘‘साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर यह उसका स्वभाव न होता, तो शायद वह साहित्यकार ही न होता। उसे अपने अन्दर भी एक कमी महसूस होती है और बाहर भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है। अपनी कल्पना में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वच्छंदता की जिस अवस्था में देखना चाहता है, वह उसे दिखाई नहीं देती। इसलिए, वर्तमान मानसिक और सामाजिक अवस्थाओं से उसका दिल कुढ़ता है। वह इन अप्रिय अवस्थाओं का अन्त कर देना चाहता है, जिससे दुनिया जीने और मरने के लिए इससे अधिक अच्छा स्थान हो जाये। यही वेदना और यही भाव उसके हृदय और मस्तिष्क के लिए सक्रिय बनाए रखता है।’’14 समाज में बदलाव लाने की आकांक्षा साहित्यकार प्रगतिशील बनाए रखती है।
प्रेमचंद आदर्शवाद और यथार्थवाद दोनों की ही सीमाओं से परिचित थे। वे न तो यथार्थवाद के नाम पर कुत्सित चीजों के चित्रण को ही अच्छा समझते थे और न ही आदर्शवाद के नाम पर कल्पना के घोड़ों की स्वच्छन्द उड़ान, इसीलिए वे बीच के मार्ग की तलाश करते थे, जिसे वे ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ कहते हैं। वे ‘साहित्य का उद्देश्य’ निबंध में लिखते हैं कि ‘‘भारत का प्राचीन साहित्य आदर्शवाद ही का समर्थक है। हमें भी आदर्श ही की मर्यादा का पालन करना चाहिए। हाँ, यथार्थ का उसमें ऐसा सम्मिश्रण होना चाहिए कि सत्य से दूर न जाना पड़े।"
प्रेमचंद कभी आदर्शवाद की तरफ ज्यादा दिखते हैं तो कभी यथार्थवाद की तरह, यद्यपि वे आदर्शवाद से यथार्थवाद की तरफ बढ़ते हैं और यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि जब आदर्शवाद का किला दरकने लगता है तो उसको आश्रय यथार्थ जगत् में ही मिलता है। प्रेमचंद की सेवासदन से गोदान और मंगलसूत्र की यात्रा इसी का परिणाम है।
प्रेमचंद उथली, बहिर्मूखी और ऊपरी तौर से की गयी आलोचना को अच्छा नहीं मानते हैं, वे भी शुक्ल जी की तरह ‘अन्तर्वृत्तियों के सूक्ष्म व्यवच्छेद’15 की तरह ‘किसी रचना की तह में डूबकर उसके तात्विक, मनोवैज्ञानिक विवेचन’16 को उपयुक्त मानते हैं।
प्रेमचंद साहित्य और जीवन को एक-दूसरे से अविच्छिन्न मानते हैं। वे ‘जीवन में साहित्य का स्थान’ नामक निबंध में लिखते हैं कि ‘‘साहित्य का आधार जीवन है। इसी नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है, उसकी अटारियाँ, मीनार और गुम्बद बनते हैं... साहित्य तो मनुष्य के सामने जवाबदेह है।’’17 प्रेमचंद जिन शब्दों में साहित्य की जवाबदेही की बात करते हैं, वह उन्हें कबीर के समकक्ष खड़ा कर देती है। वे यह मानते थे कि ‘जनता कला का स्रोत है और उससे अलग रहकर महान साहित्य की रचना नहीं की जा सकती।’18
प्रेमचंद समाज में साहित्यकार को बहुत ऊँची जगह देते हैं। वह महफिल जुटाने वाला नहीं है, न वह दूसरों के पीछे चलने वाला खेमा-बरदार है। वह समाज का नेता और पथ-प्रदर्शक है। उनके स्मरणीय शब्द हैं- ‘‘साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है- उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली इकाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।’’19
यहाँ प्रेमचंद राजनीति को साहित्य से जोड़कर इसलिए देखते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बिना राजनीति से लड़े-भिड़े जीवन का, इस दुनिया का कल्याण नहीं है और जब जीवन का कल्याण नहीं है तो साहित्य का कैसा हो सकता है।
वे विचारधाराओं से, दुनिया के बड़े साहित्यकारों, जननायकों को और समाज सुधारकों से प्रभावित थे, उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उनके ऊपर विक्टर ह्यूगों और रोमा रोलाँ के अलावा टॉलस्टॉय का असर पड़ा है।20 लेकिन वे किसी वाद या व्यक्ति के प्रभाव से बँधे नहीं। वे मानवजीवन के उत्कर्ष-विधान का स्वप्न लेकर जीते थे और उसी को साधने का प्रयास अपने साहित्य के द्वारा करते थे, अब इस रास्ते में चाहे किसी ‘वाद’ या व्यक्ति के सिद्धान्त का पालन हो या नहीं इससे उनको कोई मतलब नहीं था। उनके विचार जॉर्ज लुकाच से मेल खाते हैं, जिसने कहा था कि ‘‘जब सामाजिक यथार्थ और विचारधारा एक-दूसरे के विरोध में हो तो जेन्यूइन लेखक यथार्थ का साथ देते हैं, विचारधारा का नहीं।’’21
प्रेमचंद की साहित्यिक भाषा-सम्बन्धी दृष्टि भी जनपक्षधता से निर्मित हुई है। वे भाषायी सांप्रदायिकता के सख्त खिलाफ थे।22 वे हिंदी और उर्दू को दो भाषा मानने के लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि उनका मानना था कि ‘‘यह सारी करामात फोर्ट विलियम कॉलेज की है जिसने एक ही जुबान के दो रूप मान लिए... जिन हाथों ने यहाँ की उस वक्त की जुबान के दो टुकड़े कर दिये उसने हमारी कौमी जिन्दगी के दो टुकड़े कर दिये।’’23 वे भाषा का सिर्फ एक पुष्ट आधार मानते थे ‘सर्वसामान्य बोधगम्यता’24 अर्थात् जिसे सब लोग सहज में समझ सकें। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘‘यदि कोई शब्द या मुहावरा या पारिभाषिक शब्द जन-साधारण में प्रचलित है, तो फिर वह इस बात की परवाह नहीं करते कि वह कहाँ से निकला है और कहाँ से आया है।’’25
वे जनसाधारण में प्रचलित भाषा-रूप को ‘हिंदुस्तानी’ कहते थे और साहित्य में इसी भाषा-रूप के प्रयोग के पक्षपाती थे। प्रेमचंद की रचनाओं का भाषिक विधान इसी ढंग का है, ताज्जुब होता है जब वे साधारण-साधारण शब्दों का प्रयोग करके असाधारण अर्थ निकाल लेते हैं। इसीलिए रामस्वरूप चतुर्वेदी ने अपने ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ में लिखते हैं कि ‘‘भाषा का सत अपनी रचना में वे पूरी तरह से निचोड़ लेते हैं।’’26
आज के लगभग 11 दशक पहले भाषा सम्बन्धी प्रेमचंद का अभिनव प्रयोग चमत्कृत कर देने वाला था। इसीलिए हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में लिखा कि ‘‘प्रेमचंद की सी चलती और पात्रों के अनुरूप रंग बदलने वाली भाषा भी पहले कभी नहीं देखी गई थी।’’27 वहीं समकालीन आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी का मानना है कि ‘‘प्रेमचंद की भाषा न किताबी हिंदी है और न किताबी उर्दू, वह सहज हिंदी भाषा है।’’28 इन्हीं खूबियों के मद्देनजर डॉ. बच्चन सिंह कहते हैं कि ‘उन्होंने हिंदी को सही भाषा दी, सही दिशा दी।’29
प्रेमचंद के पास एक सुनिश्चित सौन्दर्य-दृष्टि भी थी। वे सौंदर्य के अभिनवरूप को रीतिकालीन रंगीन चश्में से नहीं देखना चाहते थे, उसे वे अपनी हाड़-माँस की बनी हुई नंगी आँखों से ही देखना चाहते थे। इसीलिए ‘साहित्य का उद्देश्य’ बताते समय उन्होंने कहा कि ‘‘हमें सुंदरता की कसौटी बदलनी होगी। अभी तक यह कसौटी अमीरी और विलासिता के ढंग की थी।... उपवास और नग्नता में भी सौंदर्य का अस्तित्व संभव है।’’30
साधारण चीजों में सौंदर्य का दर्शन न करने के पीछे गलती संकीर्ण दृष्टि की है, उन साधारण चीजों की नहीं। इसलिए प्रेमचंद का मानना है कि ‘‘अगर उसकी सौंदर्य देखने वाली दृष्टि में विस्तृति आ जाये तो वह देखेगा कि रंगे होठों और कपोलों की आड़ में अगर रूप-गर्व और निष्ठुरता छिपी है, तो इन मुरझाये हुए होठों और कुम्हलाए गालों के आँसुओं में त्याग, श्रद्धा और कष्ट-सहिष्णुता है। हाँ, उसमें नफासत नहीं, दिखावा नहीं, सुकुमारता नहीं।’’31
वस्तुतः प्रेमचंद की इस सादी एवं सहज सौंदर्य-दृष्टि के पीछे उनका लोक के प्रति आग्रह ही सबसे बड़े कारण है और यह ‘स्वार्थ के संकुचित मण्डल’32 से उठे हुए हृदय का स्पंदन है।
इसीलिए उनकी सुन्दरता का मानक वर्ण नहीं है, जब लगभग सभी साहित्यकार गौर वर्णीया तन्वंगी का चित्रण करते नहीं अघाते थे तब उन्होंने देखने में साधारण एवं तमाम मानवीय दुर्गुणों को धारण करने वाले पात्रों को अपने उपन्यासों एवं कहानियों में केन्द्रीय स्थान दिया। यह अपने आप में एक क्रांतिकारी एवं दूरदर्शी कदम था।
प्रेमचंद उपन्यास या कहानी के पात्र को वास्तविक जीवन से जुड़ा होना आवश्यक मानते थे। इन्द्रनाथ मदान को लिखे गए एक पत्र में वे कहते हैं कि ‘‘मेरे अधिकांश चरित्र वास्तविक जीवन से लिये गये हैं, गोया उन्हें काफी अच्छी तरह पर्दे में ढँक दिया गया है। जब तक किसी चरित्र का कुछ आधार वास्तविकता में न हो तब तक वह छाया सा अनिश्चित सा रहता है और उसमें विश्वास पैदा करने की ताकत नहीं आती।’’33 वे अनुभूत एवं देखे गए सच को ही साहित्य में पिरोने के पक्षधर रहे हैं, एक प्रकार से यह मुक्तिबोध के ‘कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी’34 का ही पूर्व संस्करण है।
अब यदि प्रेमचंद के साहित्य चिंतन पर नजर डाली जाये तो उसे बुद्ध के चार आर्य सत्यों के समानांतर रखा जा सकता है-
(i) दुःख है- यथार्थ का स्वीकार
(ii) दुःख का कारण भी है- शोषण तंत्र का खुलासा
(iii) उसका निरोध भी है- आशावादी दृष्टि
(iv) इसके निरोध का उपाय भी है- उपयोगितावादी तर्क द्वारा समाधान, आनंद की साधनावस्था
इन सारे सोपानों पर वे इसलिए चल सके क्योंकि ‘‘मनुष्यता को वे सबसे बड़ी वस्तु मानते थे।’’35
इस प्रकार, प्रेमचंद की साहित्य संबन्धी चिंतन-दृष्टि आयातित नहीं है, और न ही परंपरा की दुहाई देने वालों की तरह पोंगापंथी से प्रभावित, उनकी यह दृष्टि, उनके खुद के जीवन-संघर्ष की देन है। वे मनुष्यता की रक्षा को सदैव तत्पर रहने वाले साहित्यिक हैं। इन्द्रनाथ मदान के अनुसार ‘‘प्रेमचंद मनुष्य के रूप में साहित्यकार से भी अधिक महान थे’’36 और उनकी दृष्टि, उनकी इसी महानता की उपज है।
प्रेमचंद का साहित्य चिंतन ‘मानवता’ के उत्कर्ष विधायक का चिंतन है। प्रेमचंद कुछ भी लिख रहे हों अपनी जमीन नहीं भूलते हैं, वे मनुष्यत्व की उस जमीन पर हमेशा कदम जमाये रहते हैं, जिस पर चलकर ही मानव समाज एवं सृष्टि का कल्याण होगा।
संदर्भ ग्रंथ
1. ‘यथा प्रसंग’- डॉ. नंदकिशोर नवल, किताबघर प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1992, पृष्ठ 92
2. ‘यथा प्रसंग’- डॉ. नंदकिशोर नवल, किताबघर प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1992, पृष्ठ 100
3. ‘प्रेमचंद’- कमल किशोर गोयनका, साहित्य अकादमी, पृष्ठ 20
4. ‘कुछ विचार’- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 7
5. प्रेमचंद रचना संचयन- संपादक- कमल किशोर गोयनका, निर्मल वर्मा, पृष्ठ 890
6. ‘कुछ विचार’- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 8
7. ‘कलम का सिपाही’- अमृतराय, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण अप्रैल, 1992, पृष्ठ 43
8. कुछ विचार- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 9
9. प्रेमचंद और उनका युग- डॉ. रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, सातवीं आवृत्ति 2014, पृष्ठ 123
10. ‘गोदान’- प्रेमचंद, प्रयाग पुस्तक सदन, इलाहाबाद, संस्करण 2010, पृष्ठ 46
11. कुछ विचार- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 20
12. प्रेमचंद रचना संचयन- संपादक: कमल किशोर गोयनका, निर्मल वर्मा, पृष्ठ 892
13. कुछ विचार- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 9
14. कुछ विचार- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 14
15. ‘हिंदी आलोचना’- डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, पहला छात्र, संस्करण 1992, पृष्ठ 49
16. ‘प्रेमचंद रचना संचयन’, संपादन- निर्मल वर्मा, कमल किशोर गोयनका, साहित्य अकादमी, पृष्ठ 724
17. ‘कुछ विचार’- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 90
18. ‘प्रेमचंद और उनका युग’- डॉ. रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, सातवीं आवृत्ति: 2014, पृष्ठ पहले संस्करण की भूमिका से
19. ‘कुछ विचार’ - प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 20
20. ‘प्रेमचंद और भारतीय समाज’- डॉ. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, दूसरी आवृत्ति, मार्च 2011, पृष्ठ 191
21. ‘गपोड़ी से गपशप’- काशीनाथ सिंह से संवाद, सम्पादक पल्लव, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण 2013, पृष्ठ 43
22. ‘कहानी अनकहनी’- धर्मवीर भारती, भारतीय ज्ञानपीठ, तीसरा संस्करण 2000, पृष्ठ 92
23. कुछ विचार- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 30
24. ‘कुछ विचार’- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 104
25. ‘कुछ विचार’- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 104
26. ‘हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास’- रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2011 (बाइसवाँ), पृष्ठ 141
27. ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (भूमिका रामस्वरूप चतुर्वेदी), लोकभारती प्रकाशन, सातवाँ संस्करण 2010, पृष्ठ 369
28. ‘हिंदी साहित्य का सरल इतिहास’- विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंट ब्लैकस्वान प्रा.लि., प्रथम संस्करण 2010, पृष्ठ 113
29. ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास’- डॉ. बच्चन सिंह, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 1994, पृष्ठ 203
30. ‘कुछ विचार’- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 18
31. ‘कुछ विचार’- प्रेमचंद, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2006, पृष्ठ 18
32. ‘चिंतामणि (भाग 1)- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, लोकभारती प्रकाशन, बारहवां संस्करण 2014, पृष्ठ 82
33. ‘गद्य के प्रतिमान’- विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, संस्करण 1996, पृष्ठ 9
34. ‘एक साहित्यिक की डायरी’- गजानन माधव मुक्तिबोध, भारतीय ज्ञानपीठ, ग्यारहवाँ संस्करण 2011, पृष्ठ 102
35. ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी संचयिता’- संपादक: राधावल्लभ त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2001, पृष्ठ 233
36. ‘साहित्यिक निबंध’- डॉ. गणपति चंद्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 1960, पृष्ठ 706

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