पनिहारिन तथा कुछ अन्य कविताएं

(युवा कवयित्री अनुराधा  'ओस' की कविताएँ)

  
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अनुराधा 'ओस'

      

  1. हल की धार को याद कर लेती हूँ


बहुत पहले मां ने कहा था कि

कुछ बनाते समय 

उसको याद कर लेना चाहिए

जो उस काम को

अच्छे से करता हो

तो मैं

रसोई बनाते समय

माँ को याद कर लेती हूँ

  जिंदगी की कड़वाहट

 कम करने के लिए

    पानी को 

मन को समतल बनाने के लिए

हल की नुकीली धार को

दुःख को हराने के लिए

समुद्र को

काँटे हटाने के लिए

हंसिया और दराती को

उधड़ी सीवन ठीक करने के लिए

पेड़ की छाल को

कतरन -कतरन जोड़ कर

तुरपाई करने के लिए

मकड़ी की जिजीविषा को

मन की बर्फ पिघलने के लिए

कुम्हार के आंवा को।

  

2.कभी बतियाते हैं


कभी बतियाते हैं!

एकांत में गिरे

 उस फूल से

जिसकी झड़ती पंखुरियों ने

बचाया है 

न जाने कितनी मुस्कानों को

    

और चलना निरन्तर 

उस चींटी की तरह

जिसकी जिजीविषा ने

न जाने कितनी बार

जीना सिखाया है

              

प्रकृति का दिया 

उसे सूद समेत लौटाते हैं

जीवन से कुछ क्षण

बतायाते हैं


मूक रहकर

पर्वत की तरह ,बादलों को

लिखतें हैं पत्र 

नाव के  काठ की

तरह पानी-पानी 

हो जातें हैं




फूल सी कोमलता 

हो मन मे हमारे

जितना पाया धरा से

कुछ धरा को लौटाते हैं ।।


  3.  देखा है !

अपनी ओढ़नी में

कपास के फूल को

महसूस उस हल्की

छुवन को

रूई की धुनकी की तरह

धुन रहें मन प्राण

कात-कात कर 

सूत की तरह

मन को बन रहा

एक मजबूत साड़ी 

तह -तह में 

छिपा सकूँ कुछ न कुछ

आँचल में बांध लूँ

हल्दी अक्षत

बुरी नजर से बचाने के ।।


4.धरती के फेसबुक पर----


धरती के फेसबुक पर

अपना प्रोफ़ाइल ढूढ़ती औरत को

अपनी प्रोफ़ाइल कहीं

नहीं मिलती है

हाँ मगर मिलती हैं 

बहुत सारे चुभतें सवालों के काँटे

उतरतें हैं खंजर नजरों के

वो जब भी ढूढ़ती है

स्वयं और धरती में समानता

तो दिखती है उसे 

छीलती हुई दरातियाँ

कटती है टुकड़े टुकड़े 

अपने अस्तित्व को 

धरती और औरत 

रोज चुक रहीं हैं

अगर वह बचा भी ले 

कुछ नमी कुछ आँच

उसे भी सोख लेने की

कोशिश शुरू हो जाएगी


5. पनिहारिन

 

सोचती हूँ

उस स्त्री कर विषय में

जो दूर कुँए से 

भर लाती थी जल

और सोख लेती थी हमारी प्यास

सोचती हूँ उस स्त्री के लिए भी

जो समुद्र मंथन कर

निकाल लेती थी स्नेह 

और धर देती थी 

हमारी रोटियों पर

उस स्त्री के विषय में भी सोचती हूँ

जिसने पहली बार 

मारी होगी फूँक चूल्हे में

दूसरी अग्नि बुझाने के लिए

सोचती हूँ उन स्त्रियों के

विषय में जिसने 

नही देखा होगा कभी आईना

सोचती हूँ तो 

और भी सोचने वाली बातें

निकल आती हैं

जैसे 

चेहरे को धोती हैं श्रम के जल से

जैसे 

बैठी न हो कभी ट्रेन में

जैसे

पता न हो अपना नाम

जैसे

पहचानती न हो अपनी आवाज

सोचती हूँ कैसी होगी 

इनकी जिंदगी।।

©अनुराधा 'ओस'


टिप्पणियाँ

Santosh Kumar Patel ने कहा…
बहुत प्रभावशाली रचनाएँ। बधाई अनुराधा ओस जी
S B Singh ने कहा…
बहुत बढ़िया कविताएँ। विशेष रूप से 'पनिहारिन'। अनुराधा जी को शुभकामनाएं।

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