पल्लवी मुखर्जी की कविताएँ
1.तुम'
जिनके घर फूंक दिये जाते हैं
या रौंद दिये जाते हैं
किसी देह की तरह
उन घरों के दुःखों का
लेखा-जोखा
हिसाब-किताब
क्या तुम्हारे
बही खातों में
दर्ज है
या उन्हीं की तरह
भूल चुके हो तुम
जो सिर्फ़ पन्नें पलटते हैं
देखते हैं
सरसरी तौर पे
और
याद रखते है
बस
अपनी भूख
अंतहीन भूख से
मरती आत्मा दिखती नहीं है
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| पल्लवी मुखर्जी |
जिनके घर फूंक दिये जाते हैं
या रौंद दिये जाते हैं
किसी देह की तरह
उन घरों के दुःखों का
लेखा-जोखा
हिसाब-किताब
क्या तुम्हारे
बही खातों में
दर्ज है
या उन्हीं की तरह
भूल चुके हो तुम
जो सिर्फ़ पन्नें पलटते हैं
देखते हैं
सरसरी तौर पे
और
याद रखते है
बस
अपनी भूख
अंतहीन भूख से
मरती आत्मा दिखती नहीं है
2."दुखों का हिसाब "
वह औरत
तमाम पीड़ाओं औरदुःखों को
पकड़ती नहीं है मेरी तरह
उड़ा देती है सारी पीड़ाएं
जैसे कोई चिड़िया हो
आँगन की
आँसुओं से गिरती बूंदों में
टिमटिमाते हैं तारें
जुगनुओं की तरह
जो चूल्हे की आँच पर
और चमक उठते हैं
उसकी हांडी से
खदबदाते भात की सोंधी गंध में..
टकराती है
मेरी खिड़की से और
फैल जाती है पूरे कमरे और देश में
उसका मरद
महुए से सराबोर
देखता है उसे जैसे
कोई गिद्ध हो
वह औरत
उसकी आँखों में बैठे
गिद्ध को झपटने नहीं देती
देह की कसावट को
ढाक कर
मगन हो जाती है
भात की सोंधी गंध में
3. "हम -तुम"
तुम जानते हो
मेरी
ज़रूरत भर का नमक
बित्ते भर के
आकाश का विस्तार
जिसमें
बोरी भर के
शब्द होतें हैं
एक भी शब्द के इतर
हमारी सुबह नहीं होती
शब्दों का
तानाबाना बुनते है हम
रात के
अंतिम प्रहर तक
अंतिम छोर पर
तुम्हारी आँखों पर होती हैं
एकबूंद
उसी बूंद पर
मेरी सुबह होती है..
4.स्त्री
स्त्री कोई सड़क नहीं
जिस पर चलकर
तुम ....
अपने लिए
रास्ते तय करते हो
न ही कोई
वटवृक्ष
जिसकी छाया के नीचे
बैठकर
सुस्ताना चाहते हो
स्त्री को
हरसिंगार का फूल भी
न समझना
जो
रातभर खिलकर
टपक जाता है
तुम्हारी हथेली में
मसलने के लिए
स्त्री
धरती की तरह है
जो
नम रहना चाहती है
मिट्टी की तरह
ताकि
एक बीज
फूट सके
उग सके
कोई पौधा
उम्मीद का..
©पल्लवी मुखर्जी

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