यह कविता लिखने का समय नहीं
प्रो. चन्द्रदेव यादव
मज़दूर दिवस पर अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर फ्रैंक स्नोडेन के शोध निष्कर्ष को कोविड-19 भूमंडलीकरण की पहली महामारी है शीर्षक समाचार के अन्तर्गत मुंबई के हिन्दुस्तान टाइम्स ने प्रकाशित किया है । इसके लेखक हैं रुद्रनीलसेन गुप्ता । उसके प्रमुख बिन्दु हैं—
1.औद्योगिक समाज के अभ्युदय के बाद हर नये मोड़ पर एक महामारी सामने आई । सबसे पहले औद्योगिक क्रांति के बाद इंग्लैंड में तपेदिक की महामारी शुरू हुई जिसे पहले राजरोग कहा जाता था ग़रीबी और गंदगी से उसका संबंध 19वीं सदी में जुड़ा । फिर प्लेग, कैंसर और एड्स जैसी बीमारियाँ आईं l ये सभी महामारियाँ अधिकांशत: पिछड़े समाजों और निर्धनों में फैलीं । अब भूमंडलीकरण के दौर में यह कोरोना महामारी फैली है ।
2. यह पहली महामारी है जो संपन्न लोगों के बीच से आई और वहाँ से नीचे फैली । अब यह गरीबों और श्रमिकों के लिए काल बन गई है । गाँव तब तक इससे अछूते रहे जब तक संक्रमित लोगों को वहाँ नहीं पहुँचाया गया । लेकिन गाँवों में इसका प्रसार अब भी कम है । सम्पन्नता के मानचित्र में गाँवों की हैसियत बहुत कम है न!
3. कोरोना को लेकर विचारधारात्मक संघर्ष शुरू हो गया है ।एक मत यह प्रचारित हो रहा है कि चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत सही हो रहा है—ताक़तवर ही जिएगा । महामारियाँ कमजोरों को धरती से हटाने के लिए आती हैं । इससे अधिक निर्लज्ज और अमानवीय कोई नज़रिया नहीं हो सकता—जबकि दूसरी ओर फफ्रैंक स्नोडेन जैसे बुद्धिजीवियों का तथ्यों पर आधारित वैज्ञानिक नज़रिया है कि महामारियाँ याद दिलाती हैं कि हम प्रकृति के विरुद्ध विकास की अवधारणा पर चल रहे हैं । मनुष्य के द्वारा प्रकृति के विरुद्ध का नज़रिया अपनाने का यह सहज परिणाम है । इसे चेतावनी के रूप में लेना चाहिए और विकास की अपनी धारा को न केवल प्रकृति के अनुकूल बनाना चाहिए बल्कि मनुष्य के लिए भी हितकर बनाना चाहिए ।
4. कार्ल मार्क्स ने गाँधी से चौथाई सदी पहले कहा था कि पूँजीवाद केवल मनुष्य का शोषण नहीं करता, प्रकृति का भी शोषण करता है । इसके परिणाम बड़े घातक होंगे । उनके सामने केवल 1830 के बाद लंकाशायर और इंग्लैंड की मज़दूर बस्तियों में फैली टी बी की महामारी थी । आगे की शताब्दियों और घटनाओं ने इसे सिद्ध किया ।
ये कुछ अवधारणात्मक बातें थीं, जिनका ज़िक्र मैंने शुरू में ही कर देना मुनासिब समझा । इससे कोरोना जैसी महामारी के प्रसार को को समझने में आसानी होगी । निस्संदेह इस महामारी में ग़रीब और श्रमिक खामख्वाह पिस रहे हैं । और यह सचमुच मनुष्य के प्रकृति विरोधी नज़रिये का परिणाम है । इस महामारी से दुनिया त्रस्त है और वह पंगु हो गई है, फिर भी दुनिया का कारोबार (औद्योगिक कारोबार) ठप हो जाने से प्रकृति में कितना सकारात्मक परिवर्तन हुआ है, इसे हम सभी महसूस कर रहे हैं । ख़ुशी की बात तो यह है कि ओज़ोन छिद्र भी बंद हो गया है ।
सोशल मीडिया से जुड़े होने के कारण उसकी तमाम पोस्टों को देखने-पढ़ने का अवसर मिलता रहा है । इन पोस्टों में कुछ कविता वाली पोस्ट भी होती थीं । उन पर और उन पर की जाने वाली टिप्पणियों पर भी नज़र थी मेरी । मेरी या किसी और की कविता पर झल्लाहट व्यक्त करते हुए एक किसी यूज़र ने लिखा था कि घर बैठे कविता करना आसान है । अगर मज़दूरों के प्रति इतनी ही सहानुभूति है तो उनके पास जाकर सीधे उनकी मदद क्यों नहीं करते? निस्संदेह वह व्यक्ति काव्य-कर्म को निठल्ले लोगों का शगल मानता होगा, तभी तो उसकी दृष्टि में कविता लिखना फ़ालतू का काम है । किसी घटना, आन्दोलन या महामारी के समय सौ-पचास ग्राम झूठ-मूठ का आँसू उँड़ेल कर वाहवाही बटोर लो । परदुखकातरता तो जैसे इस समय के कवियों में है ही नहीं, वे ज़माने और थे जब कवि लोग दूसरों के सुख-दुःख में दौड़ते-दौड़ते हलकान हो जाया करते थे । इसलिए भी मुझे लगता है कि यह कविता लिखने का समय नहीं है ।
एक दिन मैं अशोक वाजपेयी को पढ़ रहा था । कभी-कभार कालम में । इन घर-घुसे दिनों में लेखक क्या करें? शीर्षक लेख में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातों की ओर संकेत किया है । जैसे—
1. विपुल साहित्य तो पहले से ही इतना लिखा गया है कि वह आपको जीवन से जोड़ने का काम कर सकता है जिसके जीवित स्पंदन से इस समय आप बहुत दूर फिंक गए हैं ।
2. ज्यादा मुश्किल सवाल यह है कि लेखक क्या करें । बहुत से लेखक चाहते होंगे कि इस समय वे चुप ही रहें और अपनी अच्छी-बुरी रचनाओं का बोझ या ढेर बनाने-बढ़ने से बाज आयें । दूसरे लेखक इसलिए लिखते हैं कि उन्हें ऐसा करना ज़रूरी लगता है । वे अपने समय और समाज की तलाश जारी रखना चाहते हैं । उन्हें किसी सलाह की ज़रूरत नहीं होती । वे इस वैश्विक महामारी की उपेक्षा नहीं कर सकते ।
3. अन्य नागरिकों की तरह घर में बंद लेखक अपने विचार, अनुभव और भावों की अभिव्यक्ति कैसे करें? क्या इसके लिए उनके पास भाषा-शैली-दृष्टि की पर्याप्त सम्पदा है? क्या उन्हें कुछ नया ईजाद करना होगा, नये ढंग से सोचना और भाषा को बरतना होगा?
4. इस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सच्चाई के बहुत बड़े हिस्से को छिपा कर पालतूपन और स्वामिभक्ति में लगी हुई है और सामान्य नागरिक अत्यंत विकृत, अप्रामाणिक और झूठ-भरी सूचनाओं से दिग्भ्रमित हो रहे हैं । वे घृणा और अफ़वाहें फैला रहे हैं, ऐसे में लेखकों का दायित्व क्या है? सचाई पर टिके रहना और किसी लालच या दबाव में न डिगना नागरिक अपेक्षा है और नैतिक जिम्मेदारी भी ।
5. एक समस्या है । लेखक का सच दूसरों से प्रामाणिक कैसे है? प्रामाणिकता कैसे तय होगी? पहला— वास्तव में लेखक अपने सच को पूरा या परम सत्य मानने-मनवाने का कोई हठ नहीं कर सकता । साहित्य का सत्य हमेशा संशयग्रस्त होता है l दूसरा—सच्चाई कितनी भी विद्रूप क्यों न लगे, उसका बखान हमेशा मुक्तिदाई होगा । वह घृणा और भेदभाव, अलगाव और हिंसा का प्रतिरोध होगा । वह संसार से हमारे स्वाभाविक अनुराग को और गहरा करेगा । तीसरा—लेखक मानव-विरोधी, स्वतंत्रता-समता-न्याय-विरोधी शक्तियों की शिनाख्त करते हुए अपनी ज़िम्मेदारी भी तय करेगा ।
6. और लेखक हमें याद दिलाता रहता है कि ऐसे कठिन समय में भी सहज जीवन, गर्माहट भरे मानवीय संबंध और भावनाएं न तो निश्शेष हुए हैं और न ही अप्रासंगिक। साहित्य का काम आलोक देना न भी माने पर भाषा की सर्जनात्मकता अपने आप में मानवीय आलोक है ।
मैं अशोक वाजपेयी की कविताओं से ही शुरू करता हूँ l उनकी नज़र में ‘बहुत से लेखक चाहते होंगे कि इस समय वे चुप ही रहें और दूसरे वे, जिनको लिखना ज़रूरी लगता है, लिखें l क्योंकि वे अपने समय और समाज की तलाश जारी रखना चाहते हैं l वे इस विश्वव्यापी और लम्बी चल रही महामारी की उपेक्षा नहीं कर सकते l’ वे पता नहीं कौन-से लेखक होंगे जो फौरी तौर पर कुछ लिखने से बच रहे होंगे l क्या ऐसे कुछ लोग किसी महान रचना के लिए उपयुक्त समय की प्रतीक्षा में होंगे कि जब यह महामारी समाप्त होगी तो वे इस दौर के अनुभवों और स्मृतियों से थोड़ा अलग होते हुए और यथार्थ में कल्पना का मिश्रण करते हुए एक फैंटेसी की रचना करेंगे ताकि उनके कालातीत अनुभवों में आज की समस्याओं को तलाशा जा सके? खैर, समालोचन में प्रकाशित अशोक वाजपेयी की एक कविता है हम अपना समय लिख नहीं पाएंगे l क्यों नहीं लिख पाएंगे? उन्हीं से सुनिए—
यह ठहरा हुआ निर्जन समय
जिसमें पक्षी और चिड़ियाँ तक चुप हैं
जिसमें रोज़मर्रा की आवाजें नहीं सिर्फ गूंजें भर हैं,
जिसमें प्रार्थना, पुकार और विलाप सब मौन में बिला गए हैं,
जिसमें संग-साथ कहीं दुबका हुआ है
जिसमें हर कुछ पर चुप्पी समय की तरह पसर गई है,
ऐसे समय को हम कैसे लिख पाएंगे?
पता नहीं यह हमारा समय है
या हम किसी और समय में बलात आ गए हैं
इतना सपाट है यह समय
कि इसमें कोई सलवटें, परतें, दरारें, नज़र नहीं आतीं
और इससे भागने की कोई पगडंडी तक नहीं सूझती l
हम अपना समय लिख नहीं पाएंगे l
निस्संदेह कोरोना काल एक विराट त्रासदी का समय है l इसे साइलेंट बुक क्लब की फ्रैंक रिएला (Frank Riela) ने कोरोना अराजकता (corona chaos) कहा है l इस दौर की त्रासदी को किसी एक किताब में लिख पाना संभव नहीं है l हम सबकी नज़रों के सामने अभी तक दो-ढाई महीने में जितनी अमानवीय और विकट स्थितियाँ गुज़री हैं, उन्हें अगर एक-एक कहानी में पेश करना चाहें तो यह कथासरित्सागर या अलिफ़ लैला से भी वृहत् ग्रन्थ का रूप ले लेगा l लेकिन कवि को जो लग रहा है वह अर्ध सत्य है l जीवन में एक अभूतपूर्व सन्नाटा है, लेकिन शहरों की वीरान गलियों और सड़कों को छोड़ दें तो राष्ट्रीय राजमार्गों और पगडंडियों और रेलवे ट्रैक पर भूख का कोलाहल है, और निचाट रेगिस्तान की तरह प्यास का एक तृषित समुन्दर है और लाखों कराहते हुए पाँव हैं l क्या इन जगहों पर भी आज की आवाजें नहीं, कल की गूंजें भर हैं ?
मैं यहीं पर महेश आलोक की कविता इस व्यवस्था की ऐसी की तैसी का प्रारम्भिक अंश उद्धृत कर देना चाहता हूँ जिसमें बताया गया है कि कविताओं में व्यक्त असहाय मज़दूरों की पीड़ा उनकी वास्तविक पीड़ा से कितनी तुच्छ है—
वह चुपचाप चली जा रही है
राष्ट्रीय राजमार्ग पर
पसीने से लथपथ उसका शरीर
अभी इतना जीवित है
कि हवा भी डर रही है
कि हल्का सा झोंका भी उसकी
जिजीविषा को भंग न कर दे
हवा का शरीर भी ढीला पड़ गया है
वह लगभग निर्लिप्त हो गई है
उसे भूख नहीं लगती, बच्चे को लगती है
पैरों के छाले से उसे दुःख नहीं होता
बच्चा कराहता है और तभी सड़क के
हृदय के दरकने की आवाज़ आती है
जिसकी गूँज से हमारे समय में लिखी गई
तमाम कविताओं की धज्जियाँ उड़ जाती हैं
बच्चे को अपने ब्रीफकेस पर लटकाये
वह ढो रही है उसे एक वस्तु की तरह
यहाँ भी एक नया मुहावरा गढ़ने की कोशिश की गई है l सवाल उठता है कि मज़दूरों की यह पीड़ा महेश आलोक की अपनी पीड़ा है क्या? मज़दूरों के पैरों के छालों और बच्चे की कराह से बेशक सड़क का दिल दरक गया होगा, किन्तु उस पीड़ा को महसूस करके जिस तरह दूसरे लोग कविताएँ लिख रहे थे उसी तरह महेश ने भी इस कविता को लिखा होगा l
लेकिन ये मज़दूर अपना गाँव-घर छोड़ कर शहर क्यों आए और फिर शहर छोड़ने को मजबूर क्यों हुए? तो इसका उत्तर हमें भारत के असमान क्षेत्रीय विकास और आर्थिक विषमता के कारणों में मिलेगा l गाँवों और छोटे शहरों में रोज़गार के सीमित साधनों की वजह से एक बड़ी आबादी ने बड़े शहरों और महानगरों की ओर रुख किया l ये दिहाड़ी मज़दूर और निम्नवर्गीय लोग शहरों में अवांछित बनकर रहे l कुछ की नज़र में ये लोग शहरी लोगों का हक़-हिस्सा छीनकर खाते रहे l जैसे ही लॉकडाउन शुरू हुआ, ये मज़दूर जिस शहर में थे, वहीं फँस गए l इन्हें अपने गाँव-घर जाने का मौक़ा ही नहीं मिला l स्थानीय सरकारों ने उनके खाने-पीने की व्यवस्था की, लेकिन वह अपर्याप्त साबित हुई l इसलिए इन प्रवासी मज़दूरों ने पैदल, साइकिल या रिक्शा से अपने गाँव-घर का रुख किया l बाद में लाखों मज़दूर ट्रकों में भेड़-बकरियों की तरह भरकर अपने गाँव जाने पर मजबूर हुए l
हिन्दुस्तान अख़बार के 2 जून, 2020 के अंक में विभूति नारायण राय का एक लेख पढ़ा l शीर्षक था भविष्य गाँव नहीं, शहर ही हैं l उन्होंने लिखा है कि शहरों की ओर पलायन सिर्फ आर्थिक कारणों से नहीं होता है l शहर और बाज़ार दलितों और पिछड़ों को मनुष्य की पहचान देते हैं l यानी वर्ण और जाति-भेद सिर्फ़ गाँवों में है, शहर उससे मुक्त हो चुके हैं l और दूसरी बात यह कि शहर की ओर सिर्फ दलितों और पिछड़ों ने ही पलायन नहीं किया है, आर्थिक रूप से संपन्न और विपन्न अगड़ों ने भी बड़ी संख्या में शहर का रुख किया है, क्योंकि शहर में उन्हें विकास की वे संभावनाएं दिखीं जो गाँवों में नहीं थीं l और ये अब भी नहीं हैं l
खैर, लेखक ने फ़िराक गोरखपुरी के हवाले से बताया है कि भारत के गाँवों को नष्ट कर देना चाहिए l इनके बने रहने तक देश जहालत, गन्दगी और पिछड़ेपन से मुक्त नहीं हो सकता l इनकी जगह 50 हज़ार से एक लाख की आबादी वाले छोटे नगर बसाने चाहिए, जिनमें मुख्य गतिविधियाँ कृषि आधारित उद्योगों के इर्द-गिर्द घूमती हों l क्या ऐसा संभव है? क्या शहर के हर तबके के लोग जहालत, गन्दगी और पिछड़ेपन से मुक्त हो चुके हैं? राय ने लिखा है कि फ़िराक ने कहा कि पहले इस तरह की ऐतिहासिक बहसें हो चुकी हैं l हिन्द स्वराज्य या ग्राम स्वराज्य और गाँव को लेकर गाँधी के प्रेम पगे अव्यावहारिक आग्रहों पर डॉ. अम्बेडकर ने ज़मीनी यथार्थ से जुड़ी प्रतिक्रिया का भी संकेत किया है l अम्बेडकर ने बताया है कि गाँधी के लिए गाँव स्वर्ग थे और तत्कालीन समाज में जो कुछ कुरूप था वह सिर्फ आधुनिक तकनीक की वजह से था l फिर राय की टिप्पणी है कि अब इस पर बहस करने की ज़रूरत नहीं है कि यदि गाँधी के आदर्श गाँव की परिकल्पना मान ली गई होती तो हमारी खाद्य सुरक्षा का क्या होता? लेकिन अम्बेडकर की प्रतिक्रिया आज भी प्रासंगिक है l अम्बेडकर ने गाँवों को साक्षात् नरक बताया और कहा कि गाँधी अगर ‘अछूत’ परिवार में पैदा हुए होते तो उन्हें इस स्वर्ग की असलियत का पता चलता l
विभूतिनारायण राय ने ठीक ही लिखा है कि शहरों और महानगरों में अनियोजित और अमानवीय शहरी विकास हुआ l गगनचुम्बी इमारतों, साफ-सुथरी सड़कों और हरे-भरे पार्कों के बगल में बजबजाते नालों के किनारे कच्ची बस्तियां इसकी गवाह हैं l आज़ादी के बाद रहने लायक़ शहर बसाने के प्रयास कभी नहीं किए गए l राजनीतिक लाभ के लिए स्लम में बिजली-पानी जैसी सुविधाएं ज़रूर दे दी गईं l पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार ने संभवत: यह विचार व्यक्त किया था वह चालीस लाख से अधिक श्रमिकों को गाँवों में ही रोक लेगी और उन्हें स्थानीय स्तर पर रोज़गार देगी—यह देखने वाली बात होगी l राय ने अंतत: यह निष्कर्ष दिया कि भविष्य अंतत: शहरों का ही है l इन लाखों श्रमिकों को गाँव में रोककर रोज़गार देने की जगह उन्हें फ़िराक गोरखपुरी की सलाह पर गौर करना चाहिए और गाँवों का मोह त्यागकर छोटे-छोटे नगर बसाने की सोचना चाहिए l यह प्रस्ताव कितना व्यावहारिक है, यह बहस का मुद्दा है l इससे न जाने कितनी लोकभाषाओं, लोकसाहित्य-कला-संगीत के साथ स्वस्थ सामाजिक मूल्य, संस्कार और सामाजिक सद्भाव-सहभाव के विलोप और भ्रंश का खतरा है l सवाल तो यह भी है कि इन नियोजित नगरों में निर्धन-भूमिहीनों के आवास और सतत विकास के क्या मानदंड होंगे?
बहरहाल, मज़दूर अपने गाँव-घर लौटे l लेकिन इस बार का लौटना पहले से कुछ अलग था l इस दौर में न जाने कितनी स्त्रियों ने गर्भ और मासिक स्राव और दुनिया भर की बेशर्मी को ढोते-ढोते अपने पति से पूछा—
कितना चलना है ! कब तक चलना है, कहाँ चलना है?
वह कहता है इस देश से गायब हो गया है, उसका गाँव
वह उचारता है ज़ोर से अपने गाँव का नाम
और गाँव भूल गया है उसकी पहचान
देश, प्रदेश, शहर और गाँव सब उससे दूर खड़े हैं
कर रहा है वह एक ऐसी यात्रा जो इतिहास में कभी नहीं दर्ज होगी
यह शैलेश सिंह की ‘प्रवासी’ कविता का एक अंश है l अच्छी कविता है यह—तमाम ऐतिहासिक और अनैतिहासिक संदर्भों को समेटे हुए l उनकी ‘लौटना’ शीर्षक कविता भी अच्छी है l
सवाल उठता है—हम कविता क्यों लिखते हैं? हम कहानी, उपन्यास या दूसरी अन्य चीज़ें क्यों लिखते हैं? सोशल मीडिया पर कुछ अशिक्षित साहित्याभिरुचि वाले ही नहीं, कुछ बड़े रचनाकार भी मान रहे थे कि इस समय कविता-कहानी लिखनेवाले फ़ालतू का लिख रहे हैं तो मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है l भारतीय मनीषियों ने तो इसका उत्तर दे दिया है—काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये l सद्य: परनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे l (काव्यप्रकाश, मम्मट) अर्थात कविता लिखने का प्रयोजन है—यश की प्राप्ति, संपत्ति-लाभ, व्यावहारिक ज्ञान, अमंगल का नाश, शीघ्र उत्कृष्ट आनन्द-लाभ और कान्तासम्मित उपदेश l निस्संदेह इससे कविता का व्यापक उद्देश्य रेखांकित होता है l लेकिन क्या यह सब इस समय लिखे जा रहे निरर्थक साहित्य पर भी लागू होता है?
आज हम जिस कविता की रचना कर रहे हैं, वह तो और भी उद्देश्यपूर्ण है l हर ज़माने में इस तरह का उद्देश्यपूर्ण साहित्य लिखा जाता रहा है l हर रचनाकार एक लक्ष्य निर्धारित करके रचना करता है l यह लक्ष्य और उद्देश्य दलित, स्त्री, आदिवासी और अल्पसंख्यक विमर्श भी हो सकता है और बरसों से चले आ रहे किसानों-मज़दूरों की समस्या या कि कोई और समस्या भी हो सकती है l नागार्जुन की तरह हर कवि शोषित-वंचित-पीड़ित के प्रति ‘प्रतिबद्ध, संबद्ध और आबद्ध’ होता है l उसकी प्रतिबद्धता बहुजन समाज कल्याण के लिए होती है l खैर, कविता के और भी कई उद्देश्य हैं l कविता मनोविकारों का शमन भी करती है l कविता मनुष्यों का संस्कार भी करती है l कविता मौजूदा समाज और उसकी व्यवस्था के समानान्तर एक नये समाज और नई व्यवस्था का विकल्प देती है l कविता व्यक्ति और समाज के बेहतर होने का स्वप्न है, कविता शोषण और अन्याय के ख़िलाफ़ अनवरत संघर्ष है l कुल मिलाकर कविता मनुष्य होने की एक तमीज़ है l
ध्यान रहे, स्वान्तःसुखाय वाला ज़माना अब नहीं रहा l कविता या साहित्य की एक सामाजिक भूमिका होती है l समाज-निरपेक्ष कविता या साहित्य कला की दृष्टि से चाहे जितना अच्छा क्यों न हो, उसका मूल्य समाज-सापेक्ष कविता के आगे शून्य होता है l सुमित्रानंदन पन्त ने लिखा था—कला के कोमल फेन का मूल्य मानवीय संवेदना के स्वस्थ सौन्दर्य से अधिक नहीं है l (चिदम्बरा, पृ. 16) वास्तव में कविता में व्यक्त अर्थ सामाजिक होता है l यहाँ व्यक्तिगत सुख-दुःख भी व्यक्तिगत नहीं होता है l बहुत पहले आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने देवदारु नामक निबंध में लिखा था कि पागल का लगना एक का लगना होता है l कवि का लगना सबको लगने लगता है l वास्तव में एक रचनाकार का अनुभव प्राय: सबका अनुभव होता जाता है l जो सबको लगे, वही अर्थ है और जो एक को लगे वह व्यर्थ है l इसीलिए अर्थ सामाजिक होता है l रचना कोरा भाव या विचार नहीं है, वह एक कला भी है l इसलिए सामाजिक समस्या, समाज के अनुभव और समाज के चिंतन को लेकर की गई रचना सामाजिकों के बीच एक नये रूप-रंग में पहुंचती है l उसमें रचनाकार की अपनी दृष्टि और कहन शैली का विशेष योगदान होता है l इसी को वैदग्ध्यभंगीभणिति या अभिव्यंजना प्रणाली भी कहते हैं l हालांकि अब कहन शैली बिलकुल सपाट हो गई है, किन्तु उसकी उपचारवक्रता में व्यंग्य का एक महीन स्वर अवश्य होता है l ‘कोरोना काल’ में लिखा गया अधिकांश साहित्य सपाट और विवरणात्मक है l उसमें व्यवस्था-विरोध का स्वर तीक्ष्ण है l विडंबनाएं इन रचनाओं को रचनाकार की दृष्टि और जनरुचि से जोड़ती हैं और उन्हें सही दिशा की ओर अग्रसर करती हैं l यही वजह है कि लोक के मर्म को छूती हुई ये रचनाएँ अर्थपूर्ण और लोकधर्मी हैं l मेरे विचार से यह ‘सही’ कविता है l इस दौर में मैंने जितनी भी कविताएँ पढ़ी हैं, उनमें से अधिकांश में व्यवस्था की आलोचना की गई है l
कोरोना महामारी के दौर में लाखों लोग क्षुधित-पीड़ित और असहाय हैं l सुविधाभोगी लोग अपने में मस्त हैं l जिधर भी नज़र डालिए, विडंबना ही विडंबना नज़र आती है l इस विडंबना को भाषा में उकेरना कितना मुश्किल है l पन्त को कभी गँवईं जीवन बहुत अच्छा लगा था l लिखा था—अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है! गँवईं गीतकार गँवईं जीवन को शहरी जीवन से बेहतर मानते हुए गाते थे—तोरी बर्फी से नीक मोर लबाही मितऊ l लेकिन देखने-सुनने में आया कि बहुत जगह गाँव वालों ने पलायन कर रहे भूखे-प्यासे मज़दूरों को अपने नलों से पानी नहीं भरने दिया l जो लोग शहरों से भागकर गाँव पहुंचे भी, उन्हें कई गाँव वालों ने इस डर से गाँव में घुसने नहीं दिया कि ये सभी शहर की बीमारी गाँव में लेकर आ गए हैं l
कोरोना काल में या तो भूखे-प्यासे असहाय, बीमार और मरे हुए लोग दिख रहे हैं अथवा विकट परिस्थितियों से संघर्ष करते हर उम्र के स्त्री-पुरुष और बच्चे l मज़दूरों की यह लाचारी, बीमारी और उनकी मौतें स्वाभाविक नहीं हैं l यह कोरोना वायरस और उससे उत्पन्न संकट से देश को मुक्त करने के क्रम में पैदा हुई स्थितियाँ हैं l यह अयाचित दुःख और संकट है l इसलिए इन अस्वाभाविक स्थितियों में सरकार की भरण-पोषण योजना और जनकल्याण के बावजूद क्षुब्ध भूखे-प्यासे ग़रीब मज़दूरों के पलायन से उत्पन्न समस्याओं को देखकर व्यवस्था की खामियों को लेकर या तो ग़ुस्सा आता है अथवा बदहाल मज़दूरों को देखकर करुणा उत्पन्न होती है l इस समय करुणा के ब्याज से दूसरे अन्य भाव भाषा और कला आदि में आकार ले रहे हैं l
तात्कालिक और कालजयी रचना
रचना दो तरह की होती है l पहली तात्कालिक और दूसरी शाश्वत रचना l अपने समय और समाज की तात्कालिक समस्याओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर लिखी गई प्रेरणा और प्रोत्साहन देने वाली रचना तात्कालिक रचना होती है, जिसमें अपने समय का सुख-दुःख, क्षोभ और आक्रोश व्यक्त होता है l इन्हीं कविताओं में निराशा और अवसाद से मुक्ति और एक बेहतर भविष्य के सपने भी होते हैं l टूटे-थके-हारे और निराश व्यक्तियों के दुःख एवं उनकी पीड़ा को संवेदनात्मक स्तर पर तत्काल व्यक्त करने वाली ऐसी रचनाओं को तात्कालिक साहित्य कहा जाता है l किसी घटना, आन्दोलन, प्राकृतिक आपदा, महामारी और विप्लव या युद्ध पर उसी समय लिखा गया साहित्य इसी तरह का साहित्य होता है l निस्संदेह इस तरह की अधिकांश रचनाओं में न तो व्यापकता होती है और न ही गहराई, फिर भी ये रचनाएँ सामाजिकों को उसी तरह अवसाद-मुक्त करने का काम करती हैं जिस तरह असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति के लिए कोई अचूक औषधि l दुःख का उत्सव मनाने का समय नहीं है यह शीर्षक मेरी कविता पर टिप्पणी करते हुए फेसबुक पर प्रो. देवेन्द्र चौबे ने लिखा था कि संकट की घड़ी में ऐसी ही रचनाएँ साथ में खड़ा होने की ताक़त प्रदान करती हैं l इस टिप्पणी से इतना तो स्पष्ट है कि तात्कालिक साहित्य समाज के नज़रिये से अपनी तात्कालिकता में बहुत उपयोगी होता है l जबकि शाश्वत या कालजयी रचनाएँ अपने समय को स्वर देती हुई उससे आगे निकल जाने वाली रचनाएं होती हैं l ये अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़ी होती हैं l ऐसी ही रचनाओं को कालजयी रचना कहा जाता है l लेकिन ऐसा नहीं है कि तात्कालिक धर्म को ध्यान में रख कर रची जानेवाली रचनाएँ अपने समाज को भविष्य के प्रति सचेत नहीं करती हैं l हक़ीक़त तो यह है कि तात्कालिक भावावेग और विचार से नि:सृत रचनाओं में से बहुत सी रचनाएँ कालजयी हो जाती हैं l
इस समय कुछ लोग तात्कालिक साहित्य पर बहस कर रहे हैं l इन बहसों का मुख्य उद्देश्य है अपने समय से संवाद करने वाली और तात्कालिक धर्म का निर्वाह करने वाली कविताओं को ख़ारिज करना l ये बहस-मुबाहसे ‘श्रेष्ठ’ कविता हेतु गंभीर आलोचना का उपक्रम हो सकते हैं l प्रियंका दुबे ने दाँते का हवाला देते हुए बताया है कि राजनीतिक कारणों से फ्लोरेंस से निर्वासित किए जाने के बाद के अपने घोर पीड़ा के वर्षों में भी तुरंत राजनीतिक रूप से ‘विद्रोही’ कविताएँ लिखने के ऑब्वियस रास्ते को नहीं चुना l कभी नहीं, एक कविता के लिए भी नहीं l बल्कि इस वक़्त उन्होंने प्रेम, मृत्यु और ईश्वर जैसे विषयों के ज़रिये उन विशाल सवालों को छुआ जिनकी पगडंडियों पर चलकर जीवन के बाकी सभी सिरों तक उतरा जा सकता है l नतीजा : ‘डिवाइन कॉमेडी’ जैसा महाग्रंथ l लम्बे समय तक याद रखे जा सकने वाला लेखन हमेशा अपनी तात्कालिकता से उपर उठकर तात्कालिक प्रश्नों पर बात करने की राह खोजता है l कोरोना के इस समय में लिखते हुए यह बात याद रखी जानी चाहिए l तात्कालिक संवेदना से पत्रकारिता ज़रूर खुद को परिभाषित कर सकती है और न्यायोचित भी ठहरा सकती है, लेकिन साहित्य में मुक्ति इतनी सुलभ नहीं l अपने टेक्स्ट में बिना तात्कालिकता को ट्रैंसेंड किए कला से साक्षात्कार लगभग दुर्लभ जितना असंभव है l
कमलाकांत त्रिपाठी ने लिखा है—कविता में उक्तिवैचित्र्य, व्यंग्योक्ति, वक्रोक्ति, अतर्क्य, अतिकथित और चमत्कारिक उक्तियां तात्कालिक वाहवाही लूट सकती हैं l लेकिन कविता का लक्ष्य क्या सिर्फ तात्कालिक वाहवाही लूटना है? क्या जीवन से उसका कोई सरोकार नहीं? शब्द-सत्ता को इतना महत्व क्यों दिया गया होगा? शब्द महज शब्द यानी ध्वनियाँ होते हैं, अर्थ, भाव और विचार के वाहक नहीं? और अर्थ, भाव, विचार का ताल्लुक जीवन से, उसमें कुछ गति लाने से, उसे दिशा देने से नहीं होता? मनुष्य में सुषुप्त पड़ी सकारात्मक संवेदना को जगाने, उसे सघन और समृद्ध करने का काम कौन और कैसे करता है? मनुष्य के क्रियमाण होने के बीज घनीभूत संवेदना में ही अंकुरित नहीं होते ?...कविता जीवन से दूर क्यों हो रही है? फेसबुकी कविताएँ पाठकों के लिए क्षणिक रूप से चमत्कृत होने, वाह वाह करने, फिर भूल जाने की चीज़ क्यों बनती जा रही है?...अधिकांश कवियों का जीवन देखकर लगता तो नहीं कि उनकी कविता में व्यक्त विचारों, मूल्यों से उनका कोई ज़मीनी ताल्लुक है!
और आलोचक वीरेन्द्र यादव की दृष्टि में हम एक महावृत्तान्त की प्रतीक्षा में हैं l स्मृति को बरक़रार रखना इस समय प्रतिरोध को खाद-पानी देना है l इस बीच जो कुछ घटा है वह सब छिटपुट कविताओं में नहीं, गोदान, मैला आँचल और धरती धन न अपना सरीखे कथा वृत्तान्त लिखे जाने के लिए है l उम्मीद की जानी चाहिए कि यह सब कुछ दर्ज होगा, कुछ देर से ही सही l
गनीमत है कि वीरेन्द्र यादव ने यह नहीं कहा कि इस समय लिखी जा रही कविताएँ निरर्थक हैं l उन्होंने कविताओं की सीमा बताते हुए कहा है कि इस त्रासदी का बयान छोटी-छोटी कविताओं में नहीं, बल्कि किसी महावृत्तान्त में ही किया जा सकता है l वीरेन्द्र यादव ने भी ऐसे किसी वृत्तान्त को अभी लिखे जाने से मना किया है l कारण, शाश्वत साहित्य की अपनी शर्तें l
यूरोप में प्लेग नामक महामारी 1857-58 में शुरू हुई l भारत में यह महामारी 1930-40 तक रही इस महामारी को लेकर यूरोप में तीन उपन्यास लिखे गए, जिनमें से दो महामारी के दौरान ही लिखे गए थे l लोगों को उनका नाम भी मालूम नहीं है l इस महामारी के बाद अल्बेयर कामू ने फ्रांसीसी भाषा में दी प्लेग नाम से जो उपन्यास लिखा, वह विश्व साहित्य में एक क्लासिक की हैसियत रखता है l यानी, यूरोप में प्लेग के दौरान लिखा गया सारा साहित्य नामोल्लेख योग्य भी नहीं है l तो क्या जैसा कि टी. एस. इलियट ने कहा है, उस तरह का होना चाहिए कि जिस परिस्थिति, घटना, वस्तु पर लिखना है उससे इतना दूर चले जाइए कि चीज़ें स्मृतियों में हों l इस सन्दर्भ में मुक्तिबोध के कला के तीन क्षण को याद कर लीजिए l यानी कला या साहित्य के लिए घटना, स्थिति, वस्तु से परे हो जाना आवश्यक है —ज्ञानातीत, अनुभवातीत, लोकातीत होना ज़रूरी है—तब श्रेष्ठ साहित्य रचा जा सकता है l उसमें कल्पना का मिश्रण आवश्यक है l मुक्तिबोध ने कामायनी : एक पुनर्विचार में भी लिखा है—कलाकार अपनी विधायक कल्पना से जीवन की पुनर्रचना करता है l
ऐतिहासिक और मिथकीय घटनाओं का तो पुनर्सृजन किया जाता है, लेकिन जो हमारी आँखों के सामने घट रहा है, उसका पुनर्सृजन क्यों? जो हाज़िर है, उसमें हुज्जत क्या? मोहम्मद इकबाल खान ने अपने विकलांग बेटे को भरतपुर से बरेली ले जाने के लिए किसी की साइकिल चुराई l उसकी ईमानदारी देखिए कि उसने अपना नाम बताते हुए साइकिल के मालिक को एक चिट्ठी भी लिखी l साइकिल चुराते समय अपराध-बोध से कितना ग्रसित रहा होगा इकबाल ! यह घटना अपने आप में एक कहानी है, कविता है l इसको स्मृति में लाकर फिर उसमें कल्पना का मिश्रण करके किस कालजयी कविता या कहानी का सृजन किया जाएगा? बहरहाल, इस समय कोरोना काल की त्रासदियों पर लिखना बेमतलब का लिखना है? एक प्रश्न के जवाब में एक बड़े लेखक ने कहा—कोरोना पर जो लिखा जा रहा है, उसकी कोई सार्थकता नहीं है l सवाल उठता है क्यों? क्योंकि उसमें अपने समय और समाज का ठोस और वीभत्स यथार्थ है? क्योंकि वह काल्पनिक नहीं है या कि यथार्थ और कल्पना और स्वप्न (रचनाकार जिस दिशा में उसे ले जाना चाहता है, वह स्वप्न) के ताने-बाने से वह नहीं बुना गया है! एक बात ध्यान देने की है कि इस तरह की यथार्थपरक कविताओं के आधार पर ही हम किसी कवि के समय, समाज और उसकी स्थितियों को जाँचते-परखते हैं l खेती न किसान को, धूत कहो अवधूत कहो (तुलसीदास) से लेकर प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, नागार्जुन आदि की तमाम कविताओं में हम उनके युग का साक्ष्य ढूँढ़ते हैं l इत्तेफ़ाक से उनमें से बहुत-सी कविताएँ / कथा-साहित्य ऐतिहासिक महत्व के भी हैं और कला की दृष्टि से भी अच्छे हैं l
क्या कमलाकांत त्रिपाठी की नज़र में फेसबुकी कविताएँ तात्कालिक वाहवाही लूटने और पाठकों को क्षणिक रूप से चमत्कृत करने तक ही सीमित हैं? संभव है इन कविताओं को पाठक जल्दी ही भूल जाएं, किन्तु न भूलने की क्या गारंटी है? इक्कीसवीं शताब्दी में अब तक यानी कोरोना काल से पूर्व तक का लिखा गया कितना साहित्य न भूले जाने योग्य है? और यह कितना हास्यास्पद है कि ‘अधिकांश कवियों का जीवन देखकर लगता तो नहीं कि उनकी कविता में व्यक्त विचारों, मूल्यों से उनका कोई ज़मीनी ताल्लुक है!’ क्या कविता से अलग कुछ लिखने वालों पर यह सवाल लागू नहीं होता है?
अपने समय तक ही प्रासंगिक बनी रहने वाली रचनाओं को अधिकांश लोग कोई भाव नहीं देते हैं l लेकिन ध्यान से देखा जाए तो यही रचनाएँ पीड़ित और प्रभावित लोगों के दुःख, स्वप्न और संघर्ष को बयान करती हैं l ऐसी रचनाएँ अपने समय से सीधे संवाद करती हैं l ‘उदासी’ शीर्षक कविता (चन्द्रदेव यादव) का एक उदहारण देखिए—
अपने कन्धों पर अपने दुःख की गठरी लादे
अन्तहीन यात्रा पर हैं मजूर
थके नहीं हैं वे
गहरी बिवाइयों और पाँव के फफोलों के बावजूद
चले जा रहे हैं
भूख और प्यास से लड़ते हुए
दुःख और उदासी को ओढ़े अनदेखे सुख की उत्कट अभिलाषा में
वास्तव में इस समय कविता नहीं, दुखद समय का दस्तावेज़ लिखा जा रहा है l दुखद समय का यह बयान संभव है कुछ लोगों को ‘रिपोर्ट’ जैसा लगे l देखिए—
ग़ज़ल नहीं, मैं तेरा बयान लिखता हूँ
तेरे ही सामने तेरी दास्तान लिखता हूँ l
तुम्हारे पाँव के नीचे भले न धरती हो
सुनो, ज़मीं को मैं आसमान लिखता हूँ l
रोटी और छत से महरूम मज़दूरों के पलायन के दर्द को इसी भाषा में लिखा जा रहा है l हर कवि अपना देखा-सुना हुआ सच लिख लेना चाहता है l एक ग़ज़ल के कुछ शेर देखिए—
सामने तेरे मजूरों की कहानी रख रहा
खुद की देखी, सुनी औरों की ज़ुबानी रख रहा l
कितने पाँवों से रिसे हैं खून, उनको देखना
गर्दिशे-क्रोना की कुछ सच्ची निशानी रख रहा l
भूख लेकर के हथेली पर जो तकते रास्ते
कौन उनके सामने रोटी औ पानी रख रहा l
बुझ गए चूल्हे मजूरों के, पतीली मौन है
अब भी कोई है जो अदहन का पानी रख रहा l
महेश कटारे तो जैसे सभी कवियों से प्रवासियों के दुःख-दर्द को बयान करने के लिए निर्देश दे रहे हैं l वे आश्वस्त हैं कि इस समय मज़दूरों की दुखद स्थितियों और उनके प्रति हुई व्यवस्था की लापरवाही के अलावा कवि और लिख ही क्या सकते हैं l उनकी ग़ज़ल का एक शेर देखिए—
पाँव में छाले आँख में आँसू पीड़ा भरी कहानी लिख
मजदूरों के साथ हुई जो सत्ता की मनमानी लिख
मैंने शुरू में ही कहा था कि इस दौर की कविताओं में व्यंग्य का एक तीखा स्वर विद्यमान है l
इस बीच वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी का एक और आलेख पढ़ रहा था l उसमें उन्होंने साहित्य की राजनीति, अकादमियों की निष्क्रियता और अप्रासंगिकता और जनसंगठनों की वर्चस्ववादी नीति के बारे में लिखा है l उन्होंने भी स्वीकार किया है कि हमारा साहित्य प्राय: व्यवस्था का आलोचक रहा है—हिन्दी में अनेक जनधर्मी या समाजधर्मी संगठन अपना वर्चस्व कायम करने की लगातार चेष्टा करते रहते हैं l इसका निषेधात्मक पक्ष यह है कि साहित्य की राजनीति साहित्य की बुनियादी बहुलता को अवमूल्यित करती है l....हिन्दी के जनधर्मी संगठन अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को कभी नज़रअंदाज नहीं करते हैं l लेकिन अक्सर वे बड़ी कट्टरता का बर्ताव करते हैं l बहुत से तो ऐसी संस्था का होने मात्र से अपने को समाजधर्मी मान लेते हैं l....लोकतंत्र की बुनियादी भावना और मूल्यों के अनुरूप हमारा साहित्य पिछले पचास-साठ वर्षों में कुछ विचलनों और संवादों को छोड़कर व्यवस्था का आलोचक ही रहा है l (जनसंदेश टाइम्स 27 मई, 2020,कभी कभार कालम)
निस्संदेह हिन्दी साहित्य प्राय: व्यवस्था के प्रतिपक्ष में खड़ा है l जनसरोकारों से जुड़ा साहित्य सामंती और पूँजीवादी अनैतिकताओं के पक्ष में खड़ा हो ही नहीं सकता है l 25 और 26 मई को दो ख़बरें प्रकाशित हुईं l खबर यह थी कि देश भर में लॉक डाउन की वजह से दूसरे राज्यों में फंसे प्रवासी मज़दूरों को लेकर चलीं 40 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें रास्ता भटक गईं l महाराष्ट्र के बसई से गोरखपुर के लिए चली ट्रेन राउरकेला पहुँच गई और मुंबई से पटना के लिए चली ट्रेन पुरुलिया जा पहुंची l रेलवे के अधिकारियों ने बताया कि ये ट्रेनें भटकी नहीं थीं, बल्कि इनका रूट जानबूझकर बदला गया था l और दूसरी खबर यह कि दो दिन के बदले नौ दिन में अपने गंतव्य तक पहुँच रही हैं स्पेशल ट्रेनें l 16 मई को सूरत से सीवान के लिए चली ट्रेन 25 मई को सीवान पहुंची l इतनी देरी से गंतव्य तक पहुँचने और भूख-प्यास की वजह से ट्रेनों में 7 लोगों की मौत हो गई l
इन घटनाओं को लेकर मोहन लाल यादव ने मज़दूर रेल नाम से बहुत ही अच्छी लघुकथा लिखी है l उत्कृष्ट व्यंग्य का यह अच्छा उदाहरण है l लेखक ने भोर में एक सपना देखा कि 15-20 डिब्बोंवाली मज़दूर ट्रेन पटरी छोड़कर सड़क मार्ग से होती हुई उसके घर के पास आकर खड़ी हो गई और सीटी बजाने लगी l उसने ड्राइवर से डरते डरते पूछा कि तुम इसे सड़क मार्ग से क्यों ले जा रहे हो? डर इसलिए लगा कि ट्रेन का ड्राइवर जब इसे मज़दूरों पर चढ़ा सकता है तो ग़ुस्सा आने पर इसे हमारे घर पर ही न चढ़ा दे l खैर, ड्राइवर ने लेखक की नादानी को नज़रंदाज़ करते हुए कहा कि देश में चल रहे आत्मनिर्भरता अभियान के चलते ट्रेनें भी आत्मनिर्भर हो गई हैं l ये कहीं भी आने-जाने और रास्ता भूलने-भटकने के लिए स्वतंत्र हैं l फिर उसने कहा कि मैं तो मज़ाक़ कर रहा था l दरअसल बात यह है कि पटरियों पर अब मज़दूर चलने लगे हैं, इसलिए ट्रेन को पटरियों पर चलाना रिस्की हो गया है l “ये आवारा मज़दूर पटरी पर ही खाना बनाते हैं, खाते हैं और वहीँ सो भी जाते हैं l ऐसे बेसुध होकर सोते हैं कि कट जाने पर भी नहीं जागते l विरोधी ससुरे इसको मुद्दा बना लेते हैं l सरकार को प्रति मज़दूर 10-15 लाख देना पड़ जाता है l रेल मंत्रालय वैसे ही घाटे में चल रहा है, ये मजूर और घाटा करवा रहे हैं l सरकार ने फैसला कर लिया है कि अब न तो देश पटरी पर चलेगा, न ही रेलगाड़ियाँ l” ड्राइवर ने बताया कि मैं तो रास्ता ही भूल गया था l दरअसल मुझे पटना जाना है l किधर से जाऊं? लेखक ने कहा कि पटना का रास्ता मुझे भी नहीं मालूम है l ऐसा करो, तुम एक मील आगे चले जाओ l वहाँ चौराहे पर गाँजे-भाँग की एक दुकान है l दुकानदार पटना का ही है, वह तुम्हें सही रास्ता बता देगा l
यह तात्कालिक उद्देश्य को लेकर लिखी गई लघुकथा है l लेकिन यह कितना मारक है, इसे बिना किसी आलोचनात्मक टूल्स के समझा जा सकता है l इसमें 8 मई को औरंगाबाद में मालगाड़ी से कटकर मरने वाले मज़दूरों से लेकर सरकार के आत्मनिर्भरता वाले नारे और 25 मई को ट्रेनों के रास्ता भटकने की घटनाओं और विडम्बनाओं पर ज़बरदस्त कटाक्ष किया गया है l इसमें मज़दूरों की लाचारी और शासन की अदूरदर्शिता तथा अन्य त्रासद स्थितियों को बारीकी से पेश कर दिया है l इसमें आए सभी सन्दर्भ वास्तविक हैं, सिर्फ इसे पेश किया गया है सपने के रूप में l
इस समय का सबसे प्रचलित शब्द और जीवंत मुहावरा है ‘पलायन’ l शहरों से पलायन के लिए मजबूर लाखों मज़दूरों का विश्वास शहरी लोगों से टूट गया है l शहर की चकाचौंध उनकी आँखों को पीड़ा दे रही है l शहर अब संभावना के तौर पर नहीं दिखाई दे रहा है उन्हें l
1947 में भारत विभाजन के समय एक बड़ी संख्या में लोगों ने पलायन किया l अपने वतन आने के लिए उन लोगों को कितनी ज़िल्लतें उठानी पड़ीं, यह सब इतिहास और साहित्य में दर्ज है l स्वतंत्र भारत में भी जब तब बाँधों और अन्य शहरी परियोजनाओं के चलते लोगों को अपना गाँव-घर छोड़कर विस्थापित होना पड़ा l लेकिन अभी-अभी दो-ढाई महीने से भारत के विभिन्न शहरों से मज़दूरों और निम्न माध्यम वर्ग के लोगों का जिस तरह से पलायन हो रहा है वह एक भयंकर त्रासदी से कम नहीं है l गुलज़ार ने अपनी एक छोटी-सी नज़्म ‘माईग्रेटिंग /कोविड-19-II-बँटवारा’ में विभाजन के समय के और इस समय के पलायन को शब्दबद्ध किया है l देखिए—
कुछ ऐसे कारवाँ देखे हैं सैंतालिस में भी मैंने
ये गाँव भाग रहे हैं अपने वतन में
हम अपने गाँव से भागे थे, जब निकले थे वतन को
हमें शरणार्थी कह के वतन ने रख लिया था
शरण दी थी
इन्हें इनकी रियासत की हदों पे रोक देते हैं
शरण देने में खतरा है
हमारे आगे पीछे, अब भी एक क़ातिल अजल है
ना मज़हब, नाम, ज़ात, कुछ पूछती है
--मार देती है
ख़ुदा जाने, ये बटवारा बड़ा है
या वो बटवारा बड़ा था
निस्संदेह सवाल बहुत बड़ा और गंभीर है l यह बँटवारा बड़ा है या वह बँटवारा बड़ा था !
ओमप्रकाश यती ने भी कोरोना काल में रोज़ी-रोटी छिन जाने के कारण उत्पन्न भयावह स्थितियों को बहुत ही खूबसूरत ढंग से अपनी ग़ज़लों में शब्दबद्ध किया है l देखिए—
लोग भूखे-प्यासे ये कब से सड़क पर हैं
माँ-पिता के साथ ही बच्चे सड़क पर हैं l
घर बनाते हैं हमारे—आप के लेकिन
रात में मज़दूर वो सोते सड़क पर हैं l
काम-धंधे बंद हैं, सब हैं मुसीबत में
अच्छे-अच्छे लोग भी अब के सड़क पर हैं l
पटरियों पर ट्रेन उनको रौंद देती है
डर के मारे जब न वो चलते सड़क पर हैं l
है हुनर हाथों में, दम भी बाजुओं में है
ये महामारी के ही चलते सड़क पर हैं l
इस समस्या को लेकर और भी कवियों ने कविताएँ लिखी हैं l इस समय शहरों से अपने गाँव की ओर पलायन कर रहे अति साधारण लोग शहरों में या रास्ते में या कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में भूख और प्यास से मर रहे हैं l मरने वालों में बच्चे, जवान, बूढ़े और स्त्री-पुरुष सभी हैं l एक बच्चे की मौत पर युवा कवि रोहित यादव की यह चिंता स्वाभाविक है—
एक बच्चा जो कल मरा
उसके साथ एक भविष्य मर गया
कोई सोच नहीं सकता था
कि वह भूख से नहीं मर सकता था
...... ...... ......
सरकार की अनदेखी से
ऐसे ही रोज़ मरते हैं भविष्य
और हम सिर्फ बातें करते हैं
हम नहीं सोचते हैं कि ऐसा क्यों होता है
--जनसन्देश टाइम्स
बिलकुल वाजिब चिंता है रोहित की l बच्चे की मौत किसी भी परिवार, समाज और देश के भविष्य की मौत होती है l और हम हैं कि इस बारे में कुछ सोचते ही नहीं हैं l कुछ न सोचने के कारण ही स्थितियाँ जस की तस बनी रहती हैं l इसलिए देश के विराट भविष्य को बचाने के लिए आगे आना होगा l पलायन करते मज़दूरों ने किस तरह अपने से ज़्यादा अपने भविष्य की चिंता की है, इसे हम सब रोज़ देखते रहे हैं l एक आदमी काँवर में अपने दोनों बच्चों को बिठाकर अपने गाँव जा रहा था l दूसरा रिक्शे को ही घर की शक्ल देकर बच्चों को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा था l एक स्त्री अपनी गर्भस्थ शिशु को धोते और कंधे से चिपके दूसरे बच्चे की हिफाज़त करते हुए भारी भरकम सूटकेस खींचते हुए चली जा रही थी l एक अन्य युवा स्त्री अपने बच्चे को सूटकेस पर लिटाकर उसे खींच रही थी l बच्चों के हिफाज़त की और भी कई कई नज़ीरें हैं l और महत्वपूर्ण यह कि रचनाकारों की चिंताओं और नसीहतों से पहले ही ये अल्पशिक्षित मज़दूर अपने बच्चे यानी देश के भविष्य के प्रति सजग थे l स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता जो कुछ भी हो ख़ूबसूरत हो का एक अंश यहाँ बहुत अर्थपूर्ण है—
जिन जाहिलों ने इस दुनिया को
बदसूरत बनाया है, उसे ख़ूबसूरत
बनाकर उन्हें शिकस्त दी जा सकती है
एक पीड़ा गाँव वालों की भी है l गाँव को उपेक्षित छोड़कर शहर में जा बसे लोग भी जब कोरोना-काल में गाँव पहुँचे तो उन्हें गाँववालों ने या तो विवशता के साथ देखा अथवा हिकारत के साथ देखा l दोनों ही स्थितियाँ कोरोना काल में बन रहे नये रिश्तों की ओर संकेत करती हैं l शहर से गाँव आए लोगों के प्रति हिकारत इसलिए कि अपने विकास के लिए शहर गए लोगों ने गाँव की कोई सुध नहीं ली l बहुतों ने तो अपने हिस्से की ज़मीन भी बेच दी और अब संकट आने पर शहर से भाग कर गाँव आ रहे हैं l इनसे गाँव में भी कोरोना फ़ैलने का खतरा है l और विवशता इसलिए कि जिस भाई ने पैसे के लिए शहर में अपना पूरा जीवन गुज़ार दिया और उसके पैसे से गाँव स्थित घर के लोग चैन से जी-खा रहे हैं, उसी भाई-भाभी और उनके बच्चों को कोरोना वायरस की वजह से उसी के पैसों से बने घर में जगह नहीं दे पा रहे हैं l वाई आर यादव के भोजपुरी में लिखे गए इस यथार्थपरक, किन्तु मार्मिक गीत का प्रारंभिक अंश देखिए—
काल चक्र ई अइसन सबके, चढ़ल कपारे डोलत बा l
बड़का भइया शहर से अइलन, केहू नइखे बोलत बा ll
बॉम्बे जइसन शहर में उनकर
चढ़ल जवानी बिट गइल,
उनहीं के पइसा से हमरे
घर के पक्की भीत भइल ll
लमवैं से अब छोटका बड़का सबही मेथी छोलत बा l
साहित्य और कला समीक्षक रवीन्द्र त्रिपाठी ने प्रयाग शुक्ल के रेखांकन पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी है l टिप्पणी में लिखा है कि इस कोरोना काल में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर तालाबंदी हुई है, लेकिन दूसरे स्तर पर तालाखुलबंदी भी हुई है l साहित्यकार और कलाकार का मन किसी स्थिति में क़ैद नहीं रह सकता है l एकांत में भी अच्छी कलाकृतियों की रचना की जा सकती है l ऐसा पहले भी हुआ है और इस कोरोना काल में भी हो रहा है l साहित्य में फेसबुक लाइव के माध्यम से नये प्रयोग हो रहे हैं और कई कलाकार समकालीन समय में उपजी दुश्चिंताओं को अपनी कला के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे हैं l यह बिलकुल सही है, किन्तु कुछ एक कलाकार ही नहीं, वरन अपने समय और समाज से जुड़े प्राय: सभी साहित्यकार-कलाकार सोशल मीडिया के माध्यमों से अपने समाज और देश से जुड़ रहे हैं l वास्तव में साहित्य और कला के क्षेत्र में यह एक अभूतपूर्व परिघटना है l साहित्यकारों और कलाकारों के लिए यह वास्तव में एकांत साधना का समय है l छायावाद के संबंध में डॉ. नगेन्द्र ने लिखा था कि ‘साहित्य व्यक्तिगत प्रयास है l’ आज यह चरितार्थ हो रहा है l लेकिन सर्जना के क्षणों में साहित्यकार और कलाकार सामाजिक द्वंद्वों और संघर्षो से असम्पृक्त नहीं होते हैं l जटिल सामाजिक संबंध और प्रक्रियायें उन्हें अलग नहीं होने देती हैं l
फिर रवीन्द्र त्रिपाठी ने कोरोना काल में प्रयाग शुक्ल के रेखांकन की प्रक्रिया को बताया है l नोएडा स्थित अपने फ्लैट की बालकनी में आकर वे सामने की बहुमंजिली इमारतों को देखते हैं और भूदृश्य बनाते हैं, लेकिन ये भूदृश्य ‘मूर्त’ नहीं हैं, बल्कि उनको अमूर्तन की ओर ले जाया गया है l अमूर्तन की वजह से इन रेखांकनों में विशिष्ट तरह की सार्वजनीनता आ गई है l कला के क्षेत्र में यह बात भले सही हो, किन्तु कविता या साहित्य के क्षेत्र में यह जरूरी नहीं कि सार्वजनीन होने के लिए अमूर्तन का सहारा लिया जाए l अमूर्तन से रचना अस्पष्ट हो जाती है l और दूसरी बात यह कि रचनागत विवरण चाहे नोएडा के हों अथवा मुंबई या कलकत्ता के, वे उन जैसी परिस्थितयों वाले सभी स्थानों के होते हैं l ‘मैला आँचल’ की समस्याएं सिर्फ पूर्णिया की नहीं हैं l ऐसी रचनाएँ भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती हैं l कोरोना काल में पलायन कर रहा मज़दूर उत्तर प्रदेश का हो या बिहार का अथवा उड़ीसा या पश्चिम बंगाल का, वह सिर्फ़ भारत का मज़दूर है l उनका दुःख, उनकी समस्याएं और उनके पलायन करने का ढंग भी लगभग एक जैसा है l हक़ीक़त तो यह है कि वह बेबस, लाचार आर्थिक विसंगतियों का शिकार हमारे देश का मज़दूर है जिसके सामने भूख की समस्या फ़िलहाल सबसे बड़ी समस्या है l एक तो अचानक घोषित लॉकडाउन की वजह से वे अपने गाँव-घर नहीं जा सके और दूसरे स्थानीय सरकारें अपने आश्वासनों को ठीक से पूरा नहीं कर सकीं, जिससे भूखे-प्यासे ये मज़दूर राज्यों की सीमा तोड़कर पैदल ही अपने वतन की ओर चल पड़े l
मैं ‘छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा’ के मज़दूर संगठनकर्ता शेख अंसार की कविता पेश कर रहा हूँ, जिसका शीर्षक है मैं मज़दूर हूँ—
इसरो, एम्स, संसद, सुप्रीम कोर्ट मैंने ही बनाये हैं
बाँध, पुल, सड़कें, लालकिला, ताजमहल, मैंने ही बनाये हैं
रेलें, विमान, जलपोत सब बनाये हैं मैंने ही
मत बता मुझे
मन्दिर मस्जिद के दावे और कहानियाँ
मैं मज़दूर हूँ
मैंने न जाने कितने
भगवान और अल्लाह के घर बनाये
आज मैं बेघर-बेदर हूँ
पर मैं ऐसा ही नहीं रहूँगा
इस बार सरकार ने जो ज़ख्म दिए हैं
वह कोरोना से भी ज़्यादा जानलेवा है
इस बार अपने आक्रोश को
दृढ़ संकल्प में बदल दूँगा मैं
आँसुओं को बदलूँगा अंगारे में
अब मेरी भूख शांत नहीं होगी
रोटी के चंद टुकड़ों से
अब मैं चबा जाऊँगा समूचे पूँजीवाद को
व्यवस्था से असंतुष्ट साधारण लोगों का आक्रोश इसी तरह फूटता है l आज के मज़दूरों को अपनी परिस्थितियों और बड़े लोगों के आश्वासनों की वास्तविकता का बोध है l अब आप कविता में ‘अमूर्तन’ की ज़रूरत को स्वयं देख लीजिए l यह अभिधामूलक कविता अपने स्वरूप और तेवर में बारीक़ शब्द-गुम्फन वाली अबूझ कला से कमतर नहीं है l
किसी भाव-विचार और संवेदना को स्पष्ट रूप से संप्रेषित करने वाली कविता अपनी कविताई में अभिधामूलक होने पर भी श्लाघ्य है l बोधिसत्व की कविता इससे तो अच्छा था ! प्रारम्भ में सीधा सादा बयान लगती है, लेकिन अन्त तक जाते जाते वह कई अर्थ-संकेत देने लगती है l उनकी इस कविता के कुछ अंश देखिए—
इस जीवन से अच्छा था
मैं पैदल जा रहे किसी मज़दूर के
नंगे पैरों का जूता हो जाता
या मैं एक भटके यात्री की प्यास का
पानी हो जाता / या एक धू-धू दोपहर में
राख हो रही किसी बच्ची को घर पहुँचाने वाली
बस या बैलगाड़ी हो जाता
और इस सदिच्छा के बाद बोधिसत्व कहते हैं—
जीवन ऐसे अकारथ जाए एकदम
चूक जाए इस पृथ्वी पर आना
इससे तो अच्छा था / किसी झूठे शासक को बांधने की
बेड़ी हथकड़ी हो जाता...
मैं किसी सरकार की चिता की चिता की
लकड़ी हो जाता
हम जिस समय और समाज में साँसें ले रहे हैं वह बेहद छली, क्रूर, और निष्ठुर है l हमारे समय के ‘समर्थ लोग’ आत्ममुग्ध, आत्मकेंद्रित और प्रशंसाकामी हैं l अपने श्रम से समाज को सँवारने वाला एक बड़ा तबका सामाजिक विषमता की पीड़ा से त्रस्त है l अधिकतर ज़िम्मेदार लोगों ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया है l इस क्रम में सत्ता की नाकामियाँ भी उजागर हुई हैं l हमारे सामने लाखों की संख्या में भूखे-प्यासे लोग राजमार्गों पर ठोकरें खा रहे हैं l बहुतों की दर्दनाक मृत्यु भी हुई है l फिर भी उनकी अदम्य जिजीविषा उन्हें आगे बढ़ने को प्रेरित कर रही है l अनंत यात्रा पर निकले उन कुल-गोत्र-हीन अनाम मज़दूरों के संघर्ष में परोक्ष रूप से ही सही, हर कवि-लेखक और कलाकार शामिल है l
इस दौर में लिखी गई गई अधिकांश कविताएँ सपाटबयानी के शिल्प में हैं l वे चाहे मज़दूरों पर केन्द्रित हों अथवा स्त्रियों पर, विसंगति और विडंबना उनके कथ्य को धार देती है l सुभाष राय की कविता ‘एक चिट्ठी ज्योति बेटी के नाम’, डॉ. दिलीप कुमार कसबे की कविताएँ ‘कोरोना’, ‘मज़दूर’ और ‘वह’ इसी सपाटबयानी के उदाहरण हैं l मदन कश्यप, बोधिसत्व, स्वप्निल श्रीवास्तव, अंशु मालवीय आदि की कविताओं में यथार्थ को बिम्बात्मक ढंग से बयान करने की कोशिश की गई है l जबकि भास्कर चौधुरी की कविता तानाशाह प्रतीकात्मक शैली में लिखी गई ठीक ठाक कविता है—
तानाशाह भी एक दिन
और बच्चों की तरह पैदा हुआ था
माँ के गर्भ से
उसके लिए कोई आकाशीय भविष्यवाणी नहीं हुई थी
न वह ‘बुल आवर’ में पैदा हुआ कि
ज्योतिष ने भविष्यवाणी की हो—
‘उसे मारने होंगे सौ शेर
नहीं तो सौवां शेर उसकी मृत्यु का कारण होगा...
..... ..... .....
उसने अच्छी तरह समझ लिया
तानाशाह बनने का रास्ता
भूखे पेटों के ऊपर से होकर जाता है
इसी दौर में अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लारेंस फेरलिनगेटी की कविता का दया का पात्र है वह देश नाम से हिन्दी में अनुवाद किया है डॉ. कश्मीर उप्पल ने l यह कविता महान दार्शनिक खलील ज़िब्रान के विचारों पर आधारित है l संयोग से यह हमारे समकाल पर पूरी तरह लागू होती है l इसकी शुरू की दो-चार पंक्तियाँ देखिए—
दया का पात्र है वह देश
लोग जिसके भेड़ें हैं
और जिसका गडरिया
उन्हें गलत रह दिखाता है
इस कविता के बारे में और कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है l
इधर के कुछ युवा कवियों की कविताएँ अपने रूप-रंग और दृष्टि में एक नई उम्मीद जगाती हैं l जयराम सिंह जय, डॉ. शोभा शिंदे, डॉ. सरोज कुमारी, डॉ. राधा वाल्मीकि और सुशील द्विवेदी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं l जयराम सिंह जय के एक गीत की प्रारंभिक पंक्तियाँ देखिए—
पथ में बहता खून-पसीना / उसको सब मंज़ूर है
अपनी बात सुनाता हरदम / सुनता नहीं हुज़ूर है
मन में स्वप्न स्वप्न सुनहरे लेकर
छोड़ा अपना गाँव गली
घर से शहर कमाने निकले
संग-संग चल दी ‘रामकली’
किसी तरह जब मिला ठिकाना
मन प्रसन्न परदेश में
लुटी रात भर कली-कली थी
इज्ज़त पल में चली गई
मन को मारे सोच रहे थे / कैसी दिल्ली क्रूर है
कितने सधे शब्दों में जय ने एक व्यक्ति के गाँव छोड़ने, शहर जाने और वहाँ अपनी इज़्ज़त के लुट जाने की पीड़ा और शहर की क्रूरता का वर्णन कर दिया है l इसी तरह डॉ. राधा वाल्मीकि ने भी भूख की वजह से गाँव छोड़कर शहर आए मज़दूरों के पलायन का यथातथ्य वर्णन किया है—
सड़कें भरी हैं मजदूरों से
हाय ये कैसी है मजबूरी l
सभी कायदे धरे रह गए,
कहाँ गई सामाजिक दूरी l
जाने कितने सपने लेकर
मैं गाँव से निकला था l
बच्चे भूखे ना रहें बस
यही मेरी थी मजबूरी l
पिछले कई वर्षों से मीडिया—खास तौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया—का स्वरूप बदला हुआ है l वह बहुजन सुखाय बहुजन हिताय के सिद्धांत से अलग हो गया है l जनसाधारण के सवालों से मुख मोड़ चुके मीडियाकर्मी सत्ता के मुखापेक्षी बने हुए हैं l औपनिवेशिक शासन के दौरान ‘पायोनियर’ सत्ता-समर्थक अख़बार था l उसकी चुटकी लेते हुए अकबर इलाहाबादी ने लिखा था—
घर से ख़त आया है कि हो चुका है चहल्लुम उनका
पायोनियर कहता है बीमार का हाल अच्छा है l
इस शेर को वर्तमान मीडिया पर लागू कर सकते हैं l जयराम जय ने इसी मीडिया को पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग से तौबा करने की सलाह दी है—
सच को सच तू कहना सीख
सच से अब मत आँखें मींच
मत गोदी में उनकी बैठ
यदि है सच्चा ख़बरनवीस
संजय कुंदन ने गोदी मीडिया पर व्यंग्य करते हुए लिखा है कि वह झूठ को ही सच के रूप में परोस रहा है l इस समय कविता ही है जो लोगों तक सच को पहुँचा रही है—
अखबारों में एक नायक की दाढ़ी भी खबर है
कविता की, उस दाढ़ी में छिपे तिनके पर नज़र है
सरोज कुमारी ने इधर कुछ बेहतरीन कविताएँ लिखी हैं l इस दौर में अधिकांश कवियों ने शहर से गाँव के लिए मज़दूरों के पलायन और पलायन के समय की त्रासदी को अपनी कविता का विषय बनाया है l शहर और उसकी रिक्तता तथा शहरी लोगों की पीड़ा को बहुत कम कवियों ने शब्दबद्ध किया है l सरोज की कविता ‘सन्नाटा’ उस सन्नाटे को तोड़ती है l देखिए—
मेरे घर के सामने
दूर तक पसरी ख़ामोशी
बहुत बेचैन कर जाती है
सड़क पर पड़े हुए पत्तों की खड़खड़ाहट
हृदय को झकझोर देती है
बौर से लादे हुए मुरझाये आम के पेड़ पर
कोयल अब भी आती है
गाती है कोई शोकगीत
सरोज कुमारी की कविता ‘मुंडेरन’ अपने कथ्य में भिन्न है l कोरोना महामारी के चलते लोग मास्क लगाने के लिए मजबूर हुए हैं l यह मास्क उनकी उलझन का कारण है l सरोज ने भारतीय समाज में स्त्री की उस स्थिति की ओर संकेत किया है जिसकी ओर पुरुषों ने कभी ध्यान ही नहीं दिया l वास्तव में लम्बे घूँघट और घर में क़ैद रहने के लिए अभिशप्त स्त्रियाँ कैसे अपना जीवन गुज़ारती रही हैं, उनकी इसी पीड़ा की ओर सरोज ने ध्यान दिलाया है l
मृदुला सिंह (अम्बिकापुर) ने भी उस पीड़ा को स्वर देते हुए लिखा है कि पुरुष दो महीने में ही लॉक डाउन से ऊब गए, लेकिन स्त्रियाँ तो सदियों से लॉक डाउन में रहती आई हैं—
जानना हो उनके मन का तो तोड़ो ताले
बरसों पुरानी उनकी जंग लगी संदूकों के
मिलेंगे उसमें थोड़े पहाड़ी बादल के टुकड़े
खुला सा आकाश / थोड़ी धूप / थोड़ी हवा
और कुछ सोन चिड़िया के सुनहरे पंख
जिन पर सदियों का लॉक डाउन है
गुंजन श्रीवास्तव ‘विधान’ की लिखी कोरोना के बारे में जानती थी दादी शीर्षक कविता में भी कोरोना के बहाने घर-परिवार में भी स्त्रियों के उपेक्षित और एकाकी जीवन को सामने लाने की कोशिश की गई है l हम भी स्त्रियों के उस जीवन के साक्षी रहे हैं l घर-परिवार में बहुओं के कार्य-व्यापार, उठने-बैठने, हँसने-बोलने पर बारीक़ नज़र रखी जाती थी l हाथ-भर के घूंघट में सिकुड़ी-सिमटी-सी रहने वाली बहुएँ ‘अम्मा’ और ‘बाबूजी’ के कठोर नियंत्रण में रहा करती थीं l गुंजन ने लिखा है—
मेरी बूढ़ी हो चली दादी को
हो गई थी सत्तर वर्ष पहले ही
कोरोना वायरस के आने की खबर
वो कह रही थी बबुआ हम तो बचपन से ही
किसी से न मिले रहे
घूँघट रहा इसलिए मास्क की ज़रूरत ही न पड़ी
घर में ही रहना होता था
और हाथ मिलाना तो वैसे भी बाबूजी मना कर गए थे
भारतीय समाज की संरचना को देखने से स्पष्ट पता चलता है कि घर-परिवार और समाज में स्त्री को कितने प्रतिबंधों के बीच रहना पड़ता था l पुरुष सत्तात्मक समाज में पुरुष ही नहीं, बल्कि पुरुष मानसिकता से आक्रांत स्त्रियाँ भी स्त्रियों की स्वतंत्रता की विरोधी रही हैं l तुलसीदास युगीन समाज की तरह वे मानती रही हैं कि स्वतंत्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं l और समाज में ऐसी बिगड़ी हुई स्त्रियों को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता रहा है—
महाबृष्टि चलीं फूटि कियारी l
जिमी सुतंत्र होइ बिगरहिं नारी ll
कोरोना काल स्त्री-काल भी रहा है l इस दौर में स्त्रियों ने कई सांस्कृतिक बंधनों को तोड़ा है l ज्योति कुमारी ने गुरुग्राम से दरभंगा तक की साइकिल से यात्रा करके पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा l ज्योति का कारनामा वाकई काबिले-तारीफ है l उस पर कई कवियों ने कविताएँ लिखी हैं l एक चिट्ठी ज्योति बेटी के नाम कविता में सुभाष राय ने उड़ीसा के नन्हे धावक बुधिया सिंह को याद करते हुए ज्योति को सचेत किया है कि अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए सरकारें तात्कालिक रूप से इन ग़रीब-वंचित प्रतिभाओं को सुन्दर सपने दिखाती हैं और कुछ समय बाद उन्हें भूल जाती हैं l सुभाष ने आखीर में लिखा है कि—
सुनो ! कोई भी दिक्कत आए
तो बोलना, चुप मत रह जाना
इस सन्दर्भ में कृष्ण कल्पित की ‘डूब मरो’ कविता भी द्रष्टव्य है l यह कविता दिल को छूती है—
मैं तुम्हारे तलुओं पर
जैतून के तेल की मालिश करना चाहता हूँ
जिन हाथों से थामा था तुमने साइकिल का हैंडल
मैं उन हाथों को चूमना चाहता हूँ
गुरुग्राम से दरभंगा तक
अपने घायल पिता को कैरियर पर बिठाकर
ले जाने वाली स्वर्णपरी
मैं तुम्हारी जय-जयकार करना चाहता हूँ
तुम्हारी करुणा तुम्हारा प्यार तुम्हारा साहस देखकर हैरान हूँ
आश्चर्य से खुली हुई हैं मेरी आँखें
मैं उन तमाम 33 कोटि देवी-देवताओं को बर्खास्त करना चाहता हूँ
जिन्होंने नहीं की तुम पर पुष्प-वर्षा
मोटर-गाड़ियों रेल-गाड़ियों और हवाई-जहाज़ों का अविष्कार
क्या आततायियों अपराधियों और धनपशुओं के लिए किया गया था
इस महामारी में तुमने अपने चपल-पाँवों से
1200 किलोमीटर तक भारतीय सड़कों पर सात दिनों तक जो
महाकाव्य लिखा था वह पर्याप्त है इस देश के महाकवियों को
शर्मिंदा करने के लिए
डूब मरो शासको
डूब मरो कवियो
डूब मरो महाजनो
ओ, साइकिल चलाने वाली मेरी बेटी
मैं तुम्हें अंतस्तल से प्यार करना चाहता हूँ l
किन्तु अकेली ज्योति ही इस तरह का कारनामा करने वाली लड़की नहीं है l इन विकट स्थितियों से संघर्ष करने वाली अनेक स्त्रियों और उनके साहसिक कृत्य से हम सभी परिचित हैं l उनके कृत्य, उनकी पीड़ाएं और उनकी निर्दंद्व सोच स्वयं में बेहतरीन कविताएँ हैं l जेल में बंद सफूरा ज़रगर के बारे में लोगों ने पता नहीं क्या क्या अनाप-शनाप कहा था l वह सब स्त्री की मर्यादा के विरुद्ध था l सफूरा की अजन्मी बिटिया की ओर से लिखी गई अंशु मालवीय की कविता उन अमर्यादाओं के प्रतिपक्ष में खड़ी है l देखिए—
सब कुछ ठीक है अम्मा!
तुम जेल की कोठरी में हो
और मैं तुम्हारी कोख में
तुम अपने वतन में हो
मैं अपने वतन में
सलाखों से रिसती धूप
रौशनदान से झाँकती चाँदनी
तुम्हारी धड़कन में सीझकर पहुंचते हैं मेरे पास l
कृष्ण कल्पित भले ही कहें कि मैं उन तमाम 33 कोटि देवी-देवताओं को बर्खास्त करना चाहता हूँ / जिन्होंने नहीं की तुम पर पुष्प-वर्षा, किन्तु विज्ञान पर आस्था और अन्धविश्वास भारी पड़ते नज़र आ रहे हैं l कोरोना संकट से मुक्ति के लिए लोगों ने करोना माई को अवतरित कर लिया है l गाँव-देहात में पुष्प-अक्षत और लड्डू-रोली से करोना माई की पूजा शुरू हो चुकी है l जिस देश में ताली और घंटे-घड़ियाल से कोरोना संकट से मुक्ति को बेहतर समझा गया हो, उस देश में करोना माई का अवतरित हो जाना विस्मयकारी नहीं है l उड़ीसा के एक पुजारी ने तो कोरोना महामारी से मुक्ति के लिए सरपंच की बलि ही दे दी थी l और एक युवती ने अपनी जीभ ही काट डाली थी l इस अन्धविश्वास को लेकर सुशील द्विवेदी ने एक कविता लिखी है, जिसका शीर्षक है कोरोना देवी l देवी के प्रकट होते ही जो जो क्रियाकलाप होने लगते हैं, सुशील ने उन सबका बहुत सुन्दर वर्णन किया है—
गाँव के सीवान में
पुराने पीपल के नीचे
कोरोना देवी का एक मन्दिर बनाया गया
और पूर्वी दीवार पर लिखा गया एक मन्त्र—
या देवी सर्वभूतेषु कोरोनारूपेण संसित:
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
डॉ. नन्दलाल भारती की भी एक शीर्षक विहीन कविता है, जिसमें भूखे-प्यासे मज़दूरों के पलायन, रास्ते में मरते मज़दूरों, सड़क पर बच्चा पैदा होने की घटना आदि का ज़िक्र किया गया है l अंत में लेखक ने लिखा है कि एक तरफ मुसीबतों की कराह लिए मज़दूर का / सफ़र निरंतर जारी है और दूसरी तरफ राजनीति के दंगल में जंग जारी है l
निस्संदेह कोरोना काल में लिखी गई कविताएँ अपने समय का ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं l ये कविताएँ अपने समाज से संवाद कायम करने की कोशिश करती हैं l बहुत-सी कविताएँ अपने रूप-विन्यास और कविताई के पैमाने पर भले ही कालजयी रचना न बन पाएं, लेकिन वे तात्कालिक धर्म का निर्वाह करने में सफल हुई हैं l इन कविताओं में एक विराट त्रासदी को लघु-लघु रूप में प्रस्तुत किया गया है l इनमें किसी एक से कोरोना महामारी से उत्पन्न त्रासद और अमानवीय स्थिति का नक्शा नहीं उभर पाता, किन्तु सबको मिलाकर पढ़ने से उसका सम्यक बोध हो जाता है l इन कविताओं में दुःख की गहरी परतें हैं, विडंबना का पारदर्शी आवरण है जो व्यंग्य (और कहीं-कहीं करुणा मिश्रित व्यंग्य) को संवेदनात्मक अवबोध से मुक्त करके ज्ञानात्मक अवबोध की ओर ले जाता है l इन कविताओं में अवसाद अवश्य है, किन्तु भविष्य के प्रति सहज अनुरक्ति भी है l डॉ. शोभा शिंदे की जिंदा रहे तो फिर आएंगे कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए—
तुम्हारे शहरों को आबाद करने
वहीँ मिलेंगे गगनचुम्बी इमारतों के नीचे
प्लास्टिक की तिरपाल से ढकी अपनी झुग्गियों में
एक उल्लेखनीय बात यह है कि, हिन्दी के कवियों की नज़र सिर्फ अपने आसपास की हलचलों तक ही सीमित नहीं है l दुनिया में महामारी से उत्पन्न त्रासदी सर्वत्र एक जैसी नहीं है, फिर भी हिन्दी के अधिकांश कवियों ने अपने यहाँ के श्रमिकों और स्त्रियों के प्रति ही अपनी संवेदना व्यक्त की है l कोरोना प्रभावित दुनिया के किसी मुल्क में संभवत: ऐसी स्थितियाँ नहीं रही हैं l लेकिन अमेरिका में नस्ली हिंसा का शिकार हुए जॉर्ज फ्लॉयड को लेकर ज़रूर कविताएँ लिखी गईं l मदन कश्यप की कविता मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ देखिए—
वह न रोया / न गिड़गिड़ाया
न दया की भीख माँगी
बस एक सच को / अपने समय
और समाज के सत्य को / तथ्य की तरह रखा
साँस टूटने से पहले की / आखिरी आवाज़ थी
मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ !
इस दौर में लिखी गई कुछ कविताएँ कविता के रूप में होते हुए भी कविताएँ नहीं हैं l ऐसी कवितानुमा कविताओं के लेखक सोशल मीडिया के सामान्य उपभोक्ता हैं अथवा किसी संगठन के पदाधिकारी या प्रवक्ता l बी आर पी के राष्ट्रीय प्रवक्ता दीपक वर्मा ‘निशांत’ की शीर्षक विहीन कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ देखें—
देश के गद्दारों ने मिलकर, कोरोना को फैलाया है l
सुरक्षा का समय मिला तो, क्यों व्यर्थ में जाया है l
जनमानस के जीवन को, मुखिया ने नरक बनाया है l
संकट था जब कोरोना का, काहे ट्रम्प बुलाया है l
अगर चीन में उदय हुआ तो, भारत कैसे आया है l
और फिर इसमें लॉक डाउन में घटी कुछ घटनाओं और सामान्य लोगों की बदहाली का वर्णन किया गया है l ऐसी तुकांतपरक रचनाओं में कविताई भले न हो, लेकिन विचार बहुत अच्छे और सामयिक हैं l इस तरह के रचनाकारों को इतना तो मालूम है कि कविता का प्रयोग कब और किन संदर्भों में किया जाना चाहिए l
यातना के शिकार मज़दूरों के प्रति कुछ असंवेदनशील लोग उनसे नितांत निस्पृह हैं l उनकी दया, माया, ममता, करुणा और परोपकार—सब स्वार्थ से प्रेरित हैं l चुटकी भर चावल, पाव भर पिसान और दस-बीस पाउच पानी बाँटकर महादानी होने का दंभ करने वाले लोग ‘दान’ का विज्ञापन करने के लिए फ़ोटो खिंचवाने और वीडियो बनाने में व्यस्त हैं l निस्संदेह कुछ लोग परदे के पीछे से पीड़ित मानवता के सूखते गले को तर करने में लगे हुए हैं, लेकिन वे कम हैं l
आज की कविताओं में कथ्य और भाव या विचार के स्तर पर समानता दिखाई देती है l कुछ विषय और घटनाएँ तो लोगों के दिलों को इस क़दर छू गई हैं कि उन पर बहुत सारे लोगों ने कविताएँ लिखी हैं l सभी छोटे-बड़े कवि सोशल मीडिया पर लगातार अपनी कविताएँ पोस्ट करते रहे हैं l हमारी अपनी संस्था ‘संवाद’ तथा दूसरी संवाद–धर्मी संस्थाएं—वाद-संवाद, परिवर्तन आदि ने भी काव्य पाठ और कवि-गोष्ठी के ज़रिये अपने समय की विद्रूपताओं को सामने लाने का काम किया है l
देश में हर कहीं एक संशय है l लगातार बढ़ता हुआ संशय कि इस भयावह समय में जबकि उम्मीदें भी दम तोड़ती नज़र आ रही हैं, हमारा क्या होगा? कोरोना काल ने हमें हमारी औक़ात बता दी है l इस दौर में जबकि पूरी दुनिया के सपनों पर ब्रेक लग गया है, हमारा कल कितना निराशाजनक और त्रासद होगा l संभव है युद्ध या प्रलय के बाद जैसी स्थितियों का सामना करना पड़े हमें l क्या कोरोना संकट से मुक्त होने के बाद बचा रहेगा हमारे बीच वह स्वाभाविक स्वस्थ राग-भाव जो मनुष्यों की अपनी विशिष्ट पहचान है l समालोचन में प्रकाशित अशोक वाजपेयी की ही एक छोटी-सी क्या? शीर्षक कविता पेश कर रहा हूँ—
क्या उत्तर दोगे तुम
जब वे पूछेंगे कि वह नीली आभा कहाँ गई?
कहाँ गया वह मांसल लाल
कहाँ वह हरियाती पीतिमा?
कैसे कहोगे तुम
कि शब्दों में अंट नहीं पाया
वह हल्का हरा अँधेरा
वह ओस की बूँद पर एक पल को चमकी धूप
वह शहर छोड़कर भूखे भागते आदमी का लाचार चेहरा
वह सब कुछ से बेखबर हवा में फुदकती चिड़िया की
चहचहाहट की स्वरलिपि?
क्या होगा तुम्हारे पास अभी भी बचा
जब तुम लौटोगे भाषा की घाटियों में
जो हरा-भरा हो और जीवन से भरपूर?
[ लेखक डॉ. चन्द्रदेव यादव जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ आलोचक हैं]

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