ओह! युधिष्ठिर!
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| इंटरनेट से साभार |
ओह! युधिष्ठिर!
तुम्हें मालूम नहीं होगा फिर भी तुम मारे जाओगे
न कोई शकुनी होंगे और न कोई दुर्योधन
न अट्ठारह अक्षौहिणी सेनाएँ
न कोई पितामह इस बार शंखनाद करेंगे
न कोई रक्तपात होगा फिर भी तुम मारे जाओगे
अकेले ,कुरुक्षेत्र में बिलकुल अकेले मारे जाओगे
ओह! युधिष्ठिर!
तुम्हें मारेंगे तुम्हारे कृपाचार्य ,
तुम्हारे द्रोण,तुम्हारे परशु
तुम्हारे इस मरण को देखने वाले होंगे हजारों संजय
फिर भी वे मौन होंगे
उनकी व्यथाएँ नदी की गर्म जलधारा की तरह उफनेगी
और तुम्हारी आत्मा किसी पुराने खंडहर ही तरह धीरे-धीरे झरने लगेगी
ओह! युधिष्ठिर!
तुम्हारा अदृश्य रक्तपात कुरुक्षेत्र में चारों तरफ दौड़ेगा
तुम्हारा यह मांसल-शरीर कट-कट कर धरती पर गिरेगा
गिद्ध नोचेंगे तुम्हें
और सूर्य भी अपनी सबसे प्रखर किरण छोड़ेगा उस दिन तुम पर
तुम देखना युधिष्ठिर
तुम्हारे ही धर्मज्ञाता तुम्हें मारेंगे उस दिन
ओह! युधिष्ठिर!
धर्म की लड़ाई में तुम अकेले बिलकुल अकेले
कुरुक्षेत्र में निहत्थे मारे जाओगे
© सुशील द्विवेदी

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