कविता
जब भी मैं स्वच्छ इतिहास
गढने की कोशिश करता हूं
मरे हुए मुर्दों,टीलों
अथवा
किसी किसान या मजदूर की
संवेदना दबाकर
मुझे जर्रे जर्रे से
सिर्फ चीत्कार सुनाई देती है
और मैं लिखना बन्द कर देता हूं....
" सुशील द्विवेदी "
गढने की कोशिश करता हूं
मरे हुए मुर्दों,टीलों
अथवा
किसी किसान या मजदूर की
संवेदना दबाकर
मुझे जर्रे जर्रे से
सिर्फ चीत्कार सुनाई देती है
और मैं लिखना बन्द कर देता हूं....
" सुशील द्विवेदी "
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